शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

वंदना वाजपेयी की कवितायें

  
   प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर स्त्री-विमर्श के एक नए दरवाजे को खटखटाती हुयी 
                         
                         वंदना वाजपेयी की कवितायें



एक .....

कूड़े की संस्कृति ....



चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद
बड़े भाग मानुस तन पावा पर
प्रश्नचिन्ह लगाते हुए खोली थी उसने आँख
अस्पताल के ठीक पीछे बने कूड़ा घर में
जहाँ आस -पास ,इधर -उधर बिखरा पड़ा था
"कूड़ा ही कूड़ा "जबरन खीच कर निकाले गए कन्या भ्रूण
कुछ सीरिंज ,प्लास्टिक की बोतलें
पोलिथीन बैग्स अपशिष्ट पदार्थ
जो भींच कर ह्रदय से लगा लेना चाहते थे उसे
छलक आई थी ममता
जैसे हो वो उसकी संतान यही  कूड़े की संस्कृति है

जन्मदात्री माँ  ने
नौ महीनें गर्भ में रखकर  फेंक दिया था उसे यहाँ
जो शायद बचना चाहती थी प्रेम के उस फल से
जो एक धोखे के साथ किसी सफ़ेद पोश ने
डाल दिया था उसकी कोख में  
शायद निश्चिन्त थी वह यह सोचकर 
कि कूड़ा पाल ही लेता है कूड़े को
यही कूड़े की संस्कृति है


सब फेंक देते हैं कूड़े को घर के बाहर
पर कूड़ा कभी नहीं फेंकता किसी को
समां ही लेता है अपने अन्दर
हर कीच हर गंदगी, हर पाप ,हर पुन्य
मिल ही गया था उसे एक घर
कूड़े के पास किसी झुग्गी में
जहाँ कूड़े को बीन- बीन कर
खायी जाती थी रोटी
गोल-गोल
बिलकुल आम घरों की तरह
भर ही जाता था पेट
पर अपरिचित ही रहता
डकार का स्वाद ही कूड़े की संस्कृति है



एक दिन आ ही गया उधर
कूड़े का व्यापारी
गली -गली घुमते हुए
जिसकी तेज पारखी  निगाहेंजानती थी
खर -पतवार की तरह बढ़ते हुए
कूड़े को भी
बांटा  जा सकता है  लिंग के आधार पर
कि बड़े -बड़े बंगलों , महलों से लेकर
रिक्शेवाले ,खोमचेवाले तक है
कूड़े के खरीदार
यही  कूड़े की संस्कृति है


हाँ ! बन कर पहली पसंद
चल दी थी उस व्यापारी के साथ
अबोध बारह वर्ष पुराने
कूड़े की बिटिया
अनभिग्य ,अनजान सी
कि कूड़े की भी लगती हैं बोलियाँ
कुछ ज्यामिति आकारों के आधार पर
कूड़े के दामों में भी आता है
उतार -चढाव
सफ़ेद और काले रंग से
कच्ची और पक्की उम्र से
यही  कूड़े की संस्कृति है



हाँ ! अब हो गयी थी उसकी उन्नति
कूड़े से बन गयी थी कूड़ा घर
जो निगलती थी रोज
अपशिष्ट पदार्थजलती थी हर रात
अपनी चिता में
दफ़न करती थी
अपने मानवीय अधिकारों को, अरमानों को  हर सुबह सूर्य की लालिमा में
जानती थी
दफनाया या जलाया जाना ही
कूड़े का प्रारब्ध है
यही कूड़े की संस्कृति है

अक्सर इस कूड़े को खाकर
बढ़ जाता था उसका उदर
आने लगती थी डकार
मिचलाता था जी
और बढ़ जाता था थोडा सा कूड़ा
किसी मंदिर मस्जिद के प्रागण में
किसी गटर के पास
किसी निर्जन स्थान में
या किसी अस्पताल के पीछे
चाहे कुछ भी कर लो
कूड़ा कूड़े को जन्म देता ही है
यही कूड़े की संस्कृति है


कब समझेंगे यह सफ़ेद पोश
जो बड़े -बड़े बंगलों में
आलीशान मकानों में बैठे हैं
जरा रुके ,ठहरे
अब भी चेत जाये
की उनका क्षणिक उन्माद
जन्म देता रहा है
जन्म देता रहेगा
कूड़े को
और कूड़ा कभी घटता नहीं है
वह बढ़ता जाता  है
दिन दूना -रात चौगुना
इतना इस कदर
लीलने लगता है सुख -शांति को
चबा डालता है सभ्यताओं को
इसके नीचे दब कर मर जाते है  मानवीय अधिकार  
आने लगती है सडांध
मरे हुए जिस्मों की जिन्दा रूहों से 
यही कूड़े की संस्कृति है 



दो ....

"बस यूं हीं मन कर गया "




पता नहीं क्यों
बस युहीं मन कर गया
कि सुबह -सुबह की जल्दी
घर -बाहर की भाग -दौड़ के बीच
देखूँ खुद को आईने में एक बार
जरा ठहरकर
ठीक वैसे ही
जैसे
उम्र के सोलहवे वसंत में
देखती थी खुद को
आत्ममुग्ध सी
आँखों में सैकड़ों
इन्द्रधनुषी स्वप्न भरे हुए
ढूँढ कर निकाल ली वो पीली साडी
जो विवाह के बाद दी थी तुमने
यह कहते हुए
खूब फबेगा
कंचन पर कंचन
लगा ली बड़ी सी लाल बिंदी
वो मेहंदी ,वो आलता
वो नारगी रंग का सिन्दूर
पूरी मांग भर ,आगे से पीछे तक
और खड़ी हो गयी आईने के ठीक सामने 

करने लगी 
देखने की कोशिश
खुद को एक बार
अपनी नजर से


पर यह क्या ?
दिखने लगा आईने में साफ़ -साफ़
सासु माँ की दवाई का समय
बाबूजी की शाम की चाय
बिटिया की किताबे
बेटे  की गणित की चिंता
पंसारी का बिल
सिंक के बर्तन
और तुम्हारा ऑफिस से आते ही चिल्लाना
मेरे कागज़  कहाँ रख देती हो
इन सब के बीच दिखी
पीली साडी में
एक अजनबी सी औरत
जाने कितने रंगों में रंगी
जाने कितने सांचों में ढली
पहने दुसरे के जूते
जो काटते तो हैं
पर बढती ही जाती है
बिना रुके बिना थके
अरे !कहाँ हूँ मैं
फालतू में
खामखाँ
बस यूँही मन कर गया


तीन

भूकंप .....

अम्मा
सही कहती थी तुम
धरती सी होती है नारी
प्रेम दीवानी सी
काटती रहती है सूर्य के चारों ओर चक्कर
बिना रुके बिना थके
और अपने अक्ष पर थोडा झुककर
नाचती ही रहती है दिन रात
कर्तव्य की धुरी पर
पूरे परिवार को
देने को हवा -पानी ,धूप
सह जाती है असंख्य पदचाप
दे कर अपना रक्त खिलाती है
फूल -फल
हां अम्मा !!!
सही कह रही हो तुम
पर .........
कभी तो विचलित होता होगा मन
चाहती होगी छण भर विश्राम
कुछ हिस्सेदारी सूरज की भी
किरने देने के अतिरिक्त
नियमों ,परम्परों से जरा सी मुक्ति
बांटना चाहती होगी जरा सा दर्द
जरा सी घुटन
भावनाओं का अतिरेक
हां शायद तभी ... तभी
हिल जाती है सूत भर
और दरक जाती है चट्टानें
बिखर जाते हैं .-, वन -उपवन ,नगर के नगर
क्या तभी आते हैं भूकंप ?
बताओ ना ...........
पर यह क्या अम्मा ?
मेरे इस प्रतिप्रश्न पर तुम मौन
आँखों में समेटे
कुछ ........अलिखित सा
शायद !!!
नहीं -नहीं ,अवश्य
तुम भी कर रही हो चेष्टा
कब से
रोकने की एक भूकंप
अन्दर ही अन्दर



चार .....

फेसबुक पर महिलाएं  

जरा गौर से देखिये
फेस बुक पर अपने विचारों की
अभिव्यक्ति की तलाश में आई
ये महिलाएं
आप की ही माँ ,बहन बेटियाँ हैं
जो थक गयी है
खिडकियों से झांकते -झांकते
देखना चाहती है
दरवाज़ों के बाहर
देना चाहती है अपने पखों को
थोडा सा विस्तार
आँचल में समेटना चाहती है
थोडा सा आकाश
कोई हल्दी और तेल सने आँचल से
पोंछते हुए पसीना
चलाती है माउस
कोई घूंघट के नीचे से
थिरकाती है अंगुलियाँ की बोर्ड पर
कोई जीवन के स्वर्णिम वर्ष
कर्तव्यों में होम कर
देना चाहती है कुछ अपने को पहचान
कहीं आप का यह असंयत व्यव्हार
यह नाहक वाद -प्रतिवाद
जबरन उठाई गयी अंगुलियाँ
अभद्र मेसेज
बेवजह की चैटिंग
रोक न दे इनकी परवाज़
रोक दी जाये एक बहू
कंप्यूटर पर बैठने से
रोक दी जाये बेटी
कोई गीत लिखने से
और किसी सीता के समक्ष
फिर आ जाये अग्नि परीक्षा का प्रस्ताव
और फिर ...........
कहीं डूब न जाये
यह कागज़ यह कलम यह स्याही
सिसकियों में
अटककर रह जाये शब्द
यह भावनाएं ,यह सुरीले गीत
गले की नसों में
रुकिए
जरा तो सोचिये ........
आह !!!
कि यह हलाहल अब पिया नहीं जाता
पिया नहीं जाता ...............


परिचय और संपर्क


वंदना बाजपेयी
दिल्ली में रहनवारी
साहित्यिक पत्रिका ‘गाथांतर’ की सह-संपादक
मो ... 09818350904