शनिवार, 17 जनवरी 2015

प्रदीप अवस्थी की कवितायें





प्रदीप अवस्थी की इन कविताओं से गुजरना इस जीवन के भीतर से गुजरने जैसा है | इसमें वह प्रेम है, जो उलाहना नहीं देता, वरन एक-दूसरे को समझता है | और दुःख ऐसा, जिसे हम अपने दुश्मन के लिए भी न चाहें | इतने चुटीले और लाजबाब बिम्बों वाली कवितायें मैंने अरसे बाद पढ़ी है | सिताब दियारा ब्लॉग इस युवा स्वर का अदब और एहतराम के साथ स्वागत करता है, और साथ ही साथ यह उम्मीद भी, कि उनका यह तेवर और अधिक जवान होगा, और अधिक परिपक्व होगा |
    


     
   प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा कवि प्रदीप अवस्थी की कवितायें



1) 
       एक दूसरे को पाल-पोस कर बड़ा करने वाले प्रेमी 
       छूट जाया करते हैं |
       जहाँ हो
       मुझसे ही हो कर तो गुज़री हो वहाँ तक
       जहाँ हूँ
       तुमने ही तो अंगुली पकड़ कर पहुँचाया है
       अब जी लेते हैं
       उन बच्चों की तरह
       जो सयाने हो कर निकल पड़ते हैं घरों से
       या घरों से निकल कर हो जाते हैं सयाने
       फिर सीखते हैं जीना
       नए साथियों के साथ
       हम कितने घर जैसे थे ना।


2)

     कितना कुछ ढूँढा जा रहा है

     इधर से उधर भागते फिरते हैं लोग
     पहुँचते हैं,
     ऊबते हैं,
     लौट आते हैं ।
     नहीं पहुँचता कहीं तो बस मन !
     इसने सिर्फ़ लौटना सीखा है ।

     हर कोई ऐसे जूझता है अकेलेपन से जैसे
     खुद को ही शत्रु बना कर सामने खड़ा कर लिया हो
     और लड़ता रहे दिमाग़ के फट जाने तक
     खुद में कुछ नहीं मिलता तो बाहर जाना पड़ता है
     बाहर कुछ नहीं मिलता तो लौटना पड़ता है
     खुद से लेकिन कैसे लौटा जाए !  
   
     चुप्पी में छुपे होते हैं सबसे असरदार शब्द
     उन्हें समझ लेने वाले ही हैं सबसे निर्दयी लोग ।
     वे जान चुके हैं हमें पूरा और फिर भूल भी चुके हैं
     वे कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते बचाने के लिए ।
     वे भी शायद इसी खेल में फँसे हैं
     वे भी सीखना चाहते होंगे खुद से लौटना ।

     हम ढूँढ लाते हैं मायूसी
     उन्हीं के प्रति पालते हैं कटुता जो पूछते हैं हमें
     खुद से करते हैं नफ़रत ऐसा करने के लिए
     चुप रहते हैं घंटो
     सीख लेते हैं अभिनय
     चढ़ा लेते हैं ऐसी हँसी जो सबसे मुश्किल से हँसी जाती है
     फिर सब कुछ भूल कर घुल जाते हैं उन्ही में एक बच्चे की तरह
     कोसते हैं खुद को कि क्यों है हम ऐसे ।

     जहाँ से मिल सकता था सबसे ज्यादा प्यार,वहाँ थोड़ा भी दे ना पाए ।

     इधर से उधर भागते फिर रहे हैं लोग
     थोड़े से सुकून के लिए।
     कोलाहल है
     यह शहर फूटेगा एक दिन ।  


3)
    उनको थोड़ी सी देर तक 
    थोड़ा सा और
    हंस लेने दो ना,
    थोड़ा सा तो उड़ लेने दो साथ
    कि फिर तो गिरना ही है !
    यह बहुत दुखदायी होगा
    कि बच्चों से छीनी जाएगी माँ
    बच्चियों से छीने जाएँगे पिता ।
    मैंने ऐसे ही देखा है,
    देख पाया हूँ
    प्रेमियों को ।


4) 

    तुम दरअसल जहाँ-जहाँ 
    अपनी ख़ुशी ढूंढने निकलते हो
    वहाँ से हो कर लौटा हूँ कई दफ़े
    चुन लाया हूँ दुःख के कोहिनूर
    माँ ने हाथ में थमाई थी एक गुल्लक बचपन में
    खनखनाते सिक्कों की आवाज़
    तब्दील होती गई ख़ालीपन के शोर में ।
   गुल्लक बचपन
   जवानी अलमारी
   नींद एक लड़की ।
  सारा दुःख समेट लेती है और रोती भी नहीं
  गुल्लक,खनखनाती भी नहीं |
  तुम कभी आओ और देखो
  छुओ नहीं
  मैं दर्द का पुलिंदा हूँ
  छुओगे तो पछताओगे ।

5) 

   एक कमी है 
    बहुत चुभती है
    नहीं ! तुम्हारी नहीं ।
    तुम तो हो और रहोगी ।
    जो जब होता है
    जितना होता है,तब ही
    उसे उतना महसूस लेते
    बाद में इतना क्यों रब्बा !
    इतने ज़रा से समय में जो दे गयी हो
    वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के और बढ़ता जाता है ।
    तुम्हें बता पाता
    कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से ।
    कहीं किसी टूटी या उलझी डोर का कोई सिरा फिर मिलेगा
    और गुंध जाऊँगा उसमें
    तुम्हें साथ ले कर ।
    और ऐसा सब कहते हुए आँख से एक भी आँसू नहीं गिरता पगली
    सच
    कसम से,
    तेरी याद भी नहीं आती
    हँसते हुए कहता हूँ ।


6) 

   मैं उड़ना सीखूंगा जब 
    तुम मेरे पंखों को बाँध देना ।

   जैसे लड़खड़ाता था तुम्हारे पास आते-आते
   तुमसे दूर जाते हुए भी वैसे ही लड़खड़ाता हूँ
   और मेरी चलने की चाह ख़त्म होती जाती है ।

   किसी युद्ध में जैसे एक छोटा-सा बच्चा
   अपनी जान बचाने को बदहवास दौड़ता रहे
   और छुपने की जगह मिलने पर
   बैठकर रो पाए चैन से
   ऐसे
   गोद नसीब हो तुम्हारी
   बच्चे को मार जाए गोली कोई ।

   और जब मैं मासूम कबूतर हो जाऊँ
   तुम्हारे घर की खिड़की के एक कोने में
   बनाऊँ एक घर ।

  मेरी उड़ने की मंशा और बंधे पंखों के बीच
  देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे




7) 

      हाफलौंग की पहाड़ियाँ हमेशा याद रहेंगी मुझे ।

       वॉलन्टरी रिटायरमेंट ले कर कोई लौटता है घर 
       बीच में रास्ता खा जाता है उसे ।
       दुःख ख़बर बन कर आता है
       एक पूरी रात बीतती है छटपटाते
       सुध-बुध बटोरते ।
       अनगिनत रास्ते लील गए हैं सैकड़ों जानें ।
       एक-दूसरे से अपना दुःख कभी न कह सकने वाले अपने
       कैसे रो पाते होंगे फूट-फूट कर ।
       असम में लोग खुश नहीं है,
       बहुत सारी प्रजातियाँ अपनी आज़ादी के लिए लड़ रही हैं,
       उनके लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ा गया है शायद ।
       हथियार उठाना मजबूरी ही होती है यक़ीन मानिए
       कोई मौत लपेट कर चलने को यूँ ही तैयार नहीं हो जाता ।
       आप देश की बात करते हैं,
       युद्ध की बात करते हैं,
       देश तो लोग ही हैं ना !
       उनके मरने से कैसे बचता है देश ?
       बॉर्डर पर,कश्मीर में,बंगाल में,छत्तीसगढ़ में,उड़ीसा में,असम में
       मरते है पिता,
       उजड़ते हैं घर,
       बचते हैं देश ।
       अखबारों में कितनी ग़लत खबरें छपती हैं,यह तभी समझ आया ।
       सामान लौटता है !
       गोलियों से छिदा हुआ खाने का टिफ़िन,
       रुका हुआ समय दिखाती एक दीवार घड़ी,
       बचपन से ख़बरें सुनाता रेडियो,
       खरोंचों वाली कलाई-घड़ी,
       खून में भीगी मिठाइयाँ,
       लाल हो चुके नोट,
       वीरता के तमगे,
       और धोखा देती स्मृति ।
       कितनी बार आप लौट आए
       वो मेरी नींद होती थी या सपना या कुछ और
       जब चौखट बजती थी और आप टूटी-फूटी हालत में आते थे
       फिर कुछ दिनों में चंगे हो जाते थे
       ऐसा मैंने कुछ सालों तक देखा
       अब वो साल तक नहीं लौटते ।
      हर बार सोचा कि
      इस बार जब आप आएंगे सपने में
      तो दबोच लूँगा आपको
      सुबह उठकर सबको बोलूंगा कि देखो
      लौट आए पापा
      मैं ले आया हूँ इन्हें उस दुनिया से
      जहाँ का सब दावा करते हैं कि नहीं लौटता कोई वहाँ से,
      ऐसी सोची गई हर सुबह मिथ्या साबित हुई ।
      काश फिर आए ऐसा कोई सपना
      फिर मिल पाए वही ऊर्जा
      एक घर को
      जो पिता के होने से होती है ।
      हे ईश्वर !
      कोई कैसे यह समझ पैदा करे कि बिना झिझके सीख पाए कहना
      “ पिता नहीं हैं
      और कितनी भी क़समें खाते जाएँ हम
      कि नहीं आने देंगे किसी भी और का ज़िक्र यहाँ
      पर एक समय था,एक शहर था बुद्ध का,एक साथ था,
      फल्गु नदी बहती थी ,
      विष्णुपद मंदिर में पूर्वजों को दिलाई जाती थी मुक्ति ।
      हम यहाँ दोबारा आएंगे और करेंगे पिण्ड-दान
      ऐसा कहती,भविष्य की योजनाएँ बनाती एक लड़की
      जा बैठी है अतीत में कहीं ।
      आख़िरी स्मृतियों में बचती है रेल,
      प्लेटफार्म पर हाथ हिलाते हुए पीछे छूट जाना।
      उस आख़िरी साथ में पहली बार उन्होंने बताए थे अपने सपने ।
      सात साल पहले इसी दिन वो लौटे
      हमने उन्हेँ जला दिया ।
      फिर कभी नहीं लौटे
      पिता ।



   परिचय और संपर्क

   प्रदीप अवस्थी

    इंजीनियरिंग की पढाई-लिखाई
    रंगकर्म में विशेष रूचि
    मुंबई में रहनवारी






शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

जीवन का डायलसिस - 'जीने के लिए' --- फ़क़ीर जय





फेसबुक’ पर मिले मित्रों में ‘फ़क़ीर जय’ एक विशिष्ट उपलब्द्धि की तरह हैं | सिर्फ इसलिए नहीं कि उनका अध्ययन व्यापक है, या कि वे ज्ञान, तर्क और विवेक के चलते-फिरते ‘इनसाइक्लोपीडिया’ हैं | वरन इसलिए कि ऐसा होते हुए भी उनके पास अथाह सहजता है, और मनुष्य बने रहने की अप्रतिम चाहत भी | जिस दौर में एक लिखकर दस पढने का चलन अश्लीलता की हद तक आम हो गया हो, उस दौर वे दस लिखकर भी अलक्षित रह जाने की औदार्य रखते हैं |
सिताब दियारा ब्लॉग’ इस मामले में खुशकिस्मत है कि उसे उनके जीवन के कुछ पन्ने प्रकाशित करने का अवसर मिला था | एक बार पुनः उनके प्रति आभार को दिखाते हुए हम ‘सरिता शर्मा’ के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जीने के लिए’ पर लिखी उनकी यह समीक्षा प्रकाशित कर रहे हैं | इस समीक्षा में आप देखेंगे कि वे इस उपन्यास को परखते समय, हमारा परिचय दुनिया के कालजयी लेखन से भी कराते चलते हैं |   

 
  प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर सरिता शर्मा के आत्मकथात्मक उपन्यास    
           जीने के लिए पर ‘फ़क़ीर जय’ की यह समीक्षा  



जीवन का डायलिसिस : ‘’जीने के लिए ‘’



शिल्प के स्तर पर सरल होते हुए भी ‘जीने के लिए ‘ एक जटिल संरचना वाला उपन्यास है .संरचना से यहाँ मेरा मतलब deep structure से है जिसे ल्योतार्ड आदि उत्तराधुनिक चिंतको ने सत्ता और उसकी संरचना के पुनरुत्पादन से जोड़ के देखा है .सरिता जी का निजी यहाँ साधारणीकरण की प्रक्रिया द्वारा हर उसकी पीड़ा बन जाता है जिसने रूमानी और यथार्थ का द्वंद्व अपने बाहर ही नहीं भीतर भी झेला है .उपन्यास जटिल हालातो के बारीक़ विवरण से भरा हुआ है जो इन्सान को एक नियति के रूप में reduce कर देते हैं .इस नियति के विरुद्ध संघर्ष भी मानो एक दूसरी नियति हैं .किडनी के लिए पाकिस्तान का दौरा कहानी में एक नया आयाम जोड़ता है .यहाँ mundane और विचारधारा की दुनिया का फर्क स्पष्ट होकर उभरता है .भारत पाकिस्तान के बीच का वैमनस्य और तद्जनित संघर्ष एक ठोस राजनीतिक सत्य है मगर दैनंदिन जीवन किस तरह इसके बावजूद हस्ब मामूल अपनी ही गतिकी से चलता रहता है, उपन्यासकार ने इसे बखूबी उभारा है .बिना किसी सद्भावी लाग- लपेट और आंसू बहाऊ भावुकता के वह पारदर्शी ढंग से इसको कथा में पिरोता है .


उपन्यास की प्रोटागनिष्ट नमिता को जो आत्मीय व्यवहार पाकिस्तानी डॉक्टर और अवाम से मिलता है ,वह इस राजनितिक सत्य को अप्रासंगिक बना देता है .इस निजी संघर्ष के गाथा के भीतर भी सत्ता संघर्ष के कई सन्दर्भ उपन्यास में दिखलाये गए हैं .उपन्यास प्रेम संबंधो के स्वार्थ संबंधो में बदलते जाने को भी शिद्दत से दर्ज करता है .एक पैसे वाली लड़की को अपने स्वार्थी मंसूबे के लिए शिकार बनाने वाली लघु आत्मा के द्वारा प्रेम के तहस नहस किये जाने को भी नोट करता है .जिंदगी को जब शुरू हुआ माना जाता है –यानी शादी के बाद –तभी जिंदगी खत्म हो जाती है .जिंदगी को जहाँ खतम मान लिया जाता है –यानी शादी टूटने के बाद –वहीँ जिंदगी शुरू होती है .जिंदगी के सही मायने तभी नमिता पर खुलते हैं .स्त्री विमर्श किताबो से निकलकर जिंदगी की सच्चाई बन जाता है .अकेली तलाकशुदा औरत को जिन विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है ,उसका इतना यथार्थपरक वर्णन है कि सहसा यशपाल की याद आ जाती है .उनका उपन्यास ‘’झूठा सच ‘’ स्मृति में कही कौंधता है. कुंवर नारायण जैसो ने इसमें काव्यत्मकता की कमी की शिकायत की थी .अव्वल तो यह उपन्यास में काव्य खोजना गैर जरुरी सामन्ती दृष्टि है .फिर मेरे अनुसार काव्यात्मकता का यह अभाव उपन्यास का बहुत बड़ा गुण है न की कमी .यह उपन्यास को यथार्थवादी ऊचाई देता है जो इसे मैक्सिम गोर्की की परम्परा में खड़ा कर देती है .


मृत्यु ,किडनी फेलियर जैसी आत्यंतिक स्थितियों में मनुष्य के जिन्दा होने और जूझने का जिक्र उपन्यास में है , वह  मिशेल फूको वर्णित limit experience की कोटि का है ,यहाँ जीवन के चरम सत्य इन्सान साफ़ साफ़ देख सकता है .सरिता जी ने भी देखा है जिसका जिक्र उन्होंने उपन्यास की भूमिका में किया भी है .यहाँ आकर limit अनुभव के वे मरहले दीखते हैं जहाँ आम नैतिक मर्यादाएं दम तोड़ देती हैं और जीवन-समाज के  छुपे हुए संरचना तंतु नंगे हो जाते हैं , उनकी कार्य-प्रणालियाँ स्पष्ट हो जाती हैं .रिश्तो की बुनावट बिखर जाती है और जिन रेशो से वे रिश्ते बने हैं उनका स्वरुप प्रकट हो जाता है .जीवन की ऐसी ही आत्यंतिक घटना ने दोस्तोवोस्की के लेखक को लेखक बनाया. असफलताएं और उनके बीच मनुष्य का जूझना कथा को तात्कालिकता के साथ शाश्वतता का  आयाम देते हैं जो पृथ्वी पर मनुष्य के होने और बचे रहने मात्र से जुडा  हुआ है. पुरुष ने भी इस लड़ाई को अपनी कथा में दर्ज किया है .जैसे –एर्न्स्ट हेमिंग्वे का उपन्यास –ओल्ड मैन एंड सी तथा जैक लंडन की तमाम कहानियां !मगर वहां लड़ाई प्रकृति के विरुद्ध है .वहां युद्ध जीवन के लिए नहीं है ,प्रकृति को जीतने के लिए है .यह जिजीविषा नहीं है ,प्रकृति के विरुद्ध युयुत्सा है .या कह सकते हैं जिजीविषा है भी तो प्रकट युयुत्सा के रूप में ही हुई है और उसके प्रभाव युयुत्सा वाले ही हैं .पुरुष की कथा अहंकार की तुष्टि ,जिसे वह प्रकृति पर विजय कहता है , में तुष्टि पाती है .इसके बरक्स ‘’जीवन के लिए ‘’ में जो स्त्री-कथा दर्ज है ,उसमे स्त्री की लड़ाई ( हालाँकि इसे लड़ाई कहना उचित नहीं .क्यूंकि यहाँ चीजों को युद्ध के रूप में देखा ही नहीं गया है .मगर किसी ऐसे  उपयुक्त शब्द के अभाव में इसे लड़ाई कहना पड़ रहा है .पुरुषो की भाषा में स्त्री के व्यवहार के लिए शब्दों का अभाव है ) उस रूप में नहीं है ,यहाँ लड़ाई ‘जीने के लिए ‘ है और कई बार जीने देने के लिए भी .


नमिता में  धीरे धीरे अपने पति के प्रति वैमनस्य का लोप हो जाना इसी ‘जीने देने के लिए ‘ का स्वीकार है .सिन्धु ताई ने भी अपने पति को माफ़ कर दिया था .यह स्त्री की भाषा है .यह सहकार की भाषा है ,संहार की नहीं .यहाँ दूसरो को मार देने की अपेक्षा खुद को बचाए रखना वरेण्य है. जीवन के प्रति आकर्षण उपन्यास को जीवन से भर देता है .मृत्यु की अनुगूंजो के बीच जीवन का यह राग मालकौंस बहुत मधुर है .इसलिए यहाँ जीवन के संकट के साथ उससे लड़ने और उत्तीर्ण होने प्रसंग भी है. अन्ततः पति से अलग होने का फैसला ऐसा ही एक इन्तेहाँ था जिसमे नमिता पूरे प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती है .जीवन में आस्था बचाए रखना और इसके सहारे उसे एक सर्जनात्मक मोड़ देना इसे समकालीन लेखन से अलग करता है .समकालीन लेखन का अधिकांश शिल्प के नाम पर कृत्रिम मूल्यों और हालातो को बाजारू रोचकता के साथ प्रस्तुत करता है .गीताश्री और जयश्री  इसके ज्वलंत उद्धाहरण हैं .’जीने के लिए ‘ में मसीहाई सादगी है .औदात्य –ऊचाई भी है .देह का जो अकुंठ उल्लेख उपन्यास में है वह इसे देह को स्तानादि से पहचानने वाले समकालीन विमर्श से स्वतःसिद्ध रूप से श्रेष्ठ ठहराता है .किडनी भी देह का अंग है .बल्कि यहाँ किडनी ही देह बन गयी है, जिसके लिए देह  के तमाम अंग -उपांग, यहाँ तक दिल ओ दिमाग भी बस प्रयोजन मात्र  हैं .बाकी अंगो का काम है किडनी को बचाना .उपन्यास ने इस बात को बखूबी उकेरा है .देह विमर्श को इस तरह यह उपन्यास एक मौलिक विस्तार देता है . किडनी-विमर्श. यहाँ उपन्यासकार ने स्वयं को अभिव्यक्त होने दिया है और बाहरी यथार्थ पर भी पकड़ बनाये रखी है .इस तरह यह अनावश्यक रूप से रूमानी नहीं होता तो दूसरी तरफ इतिहास की किताब या अख़बार की रिपोर्ट होने से भी बच जाता है .
           

अगर उपन्यास में सुधार की गुंजायश है तो मेरे हिसाब से (मै गलत भी हो सकता हूँ ) वह है ,उपन्यासकार की उपस्थिति .कथा के बीच में यह प्रेमचंद की तरह intervene करना कथा प्रवाह को बाधित करता है .नाटक में यही चीज़ अच्छी है वहां यह ब्रेख्त वाला  प्रभाव उत्पन्न करती  है .मगर उपन्यास में इससे बचने से स्वाभाविकता आती है .उपन्यास को जो भी कहना है कथा के माध्यम से कहना चाहिए .हद से हद संवाद के रूप में विचार रखे जा सकते हैं .उपन्यास अंततः विचार नहीं ,कहानी है .
           

उपन्यास में ससुर द्वारा हनीमून में भी साथ साथ जाना, एक असफल जीवन को ससुर द्वारा पुत्र और पुत्रवधू के माध्यम से सफल बनाने या कुंठा की तुष्टि करना बहुत सशक्त प्रसंग है .ससुर के चरित्र से तो प्रसिद्ध फिल्म ‘एक दिन अचानक ‘ के प्रोफेसर की याद आ जाती है .सरिता जी ने चरित्र को उकेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है .दृश्यों का भी खुबसूरत चित्रण करती है .लगता है इन्हें तो स्क्रप्ट-राइटर होना था .गजब की मंजर निगारी है .मोहल्ले वालो से लड़ाई का चित्र हो या कोर्ट में पति का लुकाछिपी ,बहुत संयत बारीक़ जुबान में अयाँ हुआ है .कहा जा सकता है जहाँ दूसरे उपन्यासकार जीवन का एनालिसिस करने में लगे है इसलिए विचार और शिल्प का भारी बोझ वहां है ,वही सरिता जी ने यहाँ जीवन की एनालिसिस के बरक्स डायलिसिस की है .कथा-रक्त को छान कर एक शुद्ध कहानी हमे दी है जो  कविता नहीं है ,शिल्प नहीं है ,कथ्य नहीं है ,कहानी है –उपन्यास की शुद्ध कहानी !



परिचय और संपर्क

फ़क़ीर जय

कोलकाता में रहनवारी


गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

अविनाश कुमार सिंह की कवितायें

        
         





                       आज सिताब दियारा ब्लॉग पर अविनाश कुमार सिंह की कुछ कवितायें



एक ....
चंपी

ईश्वर किस सैलून में जाता होगा
किस उस्तरे से बनती होगी
उसकी हजामत
और निकाले जाते होंगे
नाक के बाल
किस महीन धार से
कलम के सफ़ेद बाल छंटते होंगे और
चंपी होती होगी

क्या हज्जाम से ब्लेड बदलने को
ईश्वर जिच करता होगा
डरता होगा
एड्स से और
ईश्वर के प्यादे भोजन सूँघने की तरह
ब्लेड सूँघते होंगे
और पचा जाते होंगे कि
मंदिर के पिछवाड़े मिले
ईश्वर के औरस की नाल
इसी ब्लेड से काटी गयी थी
ईश्वर आश्वस्त होता होगा
आईने को देखते हुए
कि नाक के बाल
उतने ही नरम हैं अभी
जितनी चंपी.  


दो ...

सूतक

शहर के सबसे सुंदर पेड़ का नाम
जाना नहीं जा सका है
चीन्हा नहीं जा सका है
शहर के सबसे संभावनाशील कवि के
भूरे रंग की बंडी को
शहर इस ज्ञान से भी मरहूम है कि
नदियां बहते वक़्त ज्यादा सुंदर दिखती हैं
उसे यह भी नहीं पता कि
दलमा की चोटी पर बैठा बूढ़ा आदिवासी
गांव के शहर में तब्दील होने के अंतराल का
सबसे बांका जवान था
शहतूत के जंगल से वह
जवानी की दवा लाता था
शहर के सबसे संभावनाशील कवि ने
दवा चखी थी
तब से वह जंगल पर सबसे सुंदर
गीत लिखता है
भूरे रंग की बंडी पर
गहरे काही रंग की कलम
उसे शहतूत का सबसे चमकीला
जंगल बनाये रखती है
कि शहर के सबसे सुंदर पेड़ का नाम
भूरी बंडी वाले कवि ने ही
गुलनार’ रखा था और
कविता वाली आखिरी किताब में
‘गुलनार’ की अज्ञात हत्या के लिए
शहर के पातिशाह पर
शंका जाहिर की थी

गुलनार’ वाली काली सड़क का नाम
शहर के पातिशाह ने
दिवंगत कवि की याद में
डायग्नल रोड’ रखा है
लोग डायग्नल रोड’ पर
इक्कीसवीं सदी का सूतक ओढ़े रेंगते हैं
शहतूत
गुलनार और
जंगल
दिवंगत कवि की आखिरी किताब के साथ
ठहरी नदी की जलकुंभियों में
उलझे पड़े हैं.



तीन ...

ठेका मजदूरों के ज़ानिब

चले जा रहे हैं
सायकिलों पर देह धरे
कैरियर में टांगे टिफिन
जोरू का आखिरी पेटीकोट
प्लास्टिक में प्याज और मिर्च हरी
किसी गुमनाम दर्ज़ी की तरह
चिप्पियाँ और पैबंद
चिपकाते हुए
आत्मा पर.

सपने किसी काली चादर से
अंधे हैं और
तारों को अब सुनायी नहीं देता
गूँगी दिशाओं के सन्नाटे से
दलक जाती है देह जब
पेट पकड़ कर रोता है
मुन्ना
वे ठोक देते हैं पीठ
भरोसे से
कि सो जाती है भूख फिर से, और
मुन्ना सपने में चाँद को
रोटी में ढलते देख ही लेगा
ठेका मजदूर
सायकिल
कैरियर
पेटीकोट और
मुन्ने की आत्मा को
खुदा की नजर से
बचाते है
मुन्ने के एक पैर की चप्पल
पिछले पहिये पर
लटकाकर चलते हैं      


परिचय और संपर्क

अविनाश कुमार सिंह

१० अक्टूबर १९८४ में चन्दौली (यू.पी.) में जन्म
परिकथा, संवदिया, पक्षधर, आरोह, प्रभात खबर (दैनिक) में कविताएँ व आलेख प्रकाशित
इस्पातिका नामक छमाही शोध पत्रिका का संपादन व प्रकाशन
पता : ३, न्यू स्टाफ क्वार्टर्स, को-ऑपरेटिव कॉलेज कैम्पस, सी.एच.एरिया, बिष्टुपुर, जमशेदपुर, झारखण्ड ८३१००१ मो. ०९४७१५७६४०४