गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

फेसबुक पर ईश्वर - राहुल देव









आज सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा लेखक
राहुल देव की यह व्यंग्य रचना
                                               



                      फेसबुक पर ईश्वर



आज सुबह से ही स्वर्गलोक में हड़कंप मचा हुआ था | बहुत दिनों बाद देवराज इंद्र ने देवताओं की आपातकालीन बैठक बुलाई थी | किसी को भी बैठक के एजेंडा के बारे में कुछ नहीं पता था बस कहा गया, यह आपातस्थिति है | सब मीटिंग में ही बताया जायेगा | तुरत फुरत आडर निकलवाकर दसों दिशाओं में दूतों को दौड़ा दिया गया | विशिष्ट रूप से आमंत्रित अतिथियों को लाने का कार्यभार देवर्षि नारद को सौंपा गया | खैर नियत समय पर खचाखच भरे सभाकक्ष जहाँ अप्सराएँ नृत्य किया करतीं थीं, में मीटिंग शुरू हो रही थी | त्रिदेवों को बैठने के लिए विशिष्ट आसन दिए गये | मीटिंग बस शुरू होने ही वाली थी कि दौड़ते-भागते यमराज जी भी चित्रगुप्त के साथ हाँफते हुए आये | उनकी सवारी भैसे ने उन्हें आज एन वक़्त पर धोखा दे दिया था | अन्यान्य देवी-देवता भी अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे |


विषय प्रवर्तन करते हुए देवताओं के राजा इंद्र ने अपने आप को व्यवस्थित किया तत्पश्चात अपनी जंग खाई आवाज़ को बुलंद करते हुए कहना शुरू किया- “आदरणीय त्रिदेवों एवं सम्मानित देवी-देवताओं ! आप सब सोच रहे होंगे कि आखिर क्या बात आन पड़ी कि यह इमरजेंसी मीटिंग बुलानी पड़ी | दरअसल बात यह है कि आजकल इन नामाकूल इंसानों को पता नहीं क्या होता जा रहा है, वे हमारी प्रार्थना व पूजा-अर्चना की जगह ये किसी फेसबुक नामक अस्थायी दुनिया में ज्यादा समय व्यतीत करने लगे हैं | धरती के हालात बड़े नाजुक हैं | अतः अब इस बात को हल्के में लिया जाना बेवकूफी होगी | इंद्र ब्रह्मा जी की और मुखातिब होते हुए बोले- ब्रम्हा जी आप ही देखिये आपने मानसपुत्रों की करतूतें, आपने इतनी मेहनत से यह सृष्टि बनाई और आज इन मानवों की इतनी हिम्मत कि इन लोगों ने फेसबुक नामक अपनी एक अलग आभासी दुनिया ही बना डाली | और तो और यह मूर्ख मनुष्यजाति अब हमारा पूजा-पाठ भी अपनी इसी आभासी दुनिया में करना शुरू कर दिया है | न कोई फूल-माला, न मिष्ठान, न धूप, वहां हमारे चित्रों पर हमें मिलते हैं सिर्फ लाइक्स और कमेंट्स | श्रद्धा के नाम पर ये नालायक हमारा मज़ाक बना रहे हैं | शीघ्र ही कोई ठोस निर्णय न लिया गया तो हम देवों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा | इतना कहकर देवराज थोड़ी देर के लिए रुके |


सचमुच यह एक विकट और गंभीर प्रश्न था | पूरी सभा में सन्नाटा व्याप्त था | लग रहा था सभी इंद्र की बातों को बड़ा ध्यान लगाकर सुन रहे हैं | यमराज ने कोहनी मारकर सोते हुए चित्रगुप्त को जगाया | शायद नरक में कुछ काम बढ़ जाने के कारण वे ओवरटाइम कर रहे थे जिस कारण वे धरती लोक के नेताओं की तरह अपनी नींदें इस तरह की सभाओं में पूरी कर रहे थे | उधर देवराज इंद्र ने अपने भाषण का अगला अंश प्रस्तुत किया | यह फेसबुक किसी जुकरबर्ग नाम के शैतान खोपड़ी की उपज है | लोग उसकी आभासी दुनिया को अपनी असल दुनिया से बढ़कर समझने लगे हैं | उसकी देखादेखी कई अन्य मायावियों जैसे ट्विटर, जीप्लस, लिंक्डइन, व्हात्ट्सएप ने भी अपना जाल फैलाना शुरू कर दिया है | अगर इनका कारोबार ऐसे ही चलता रहा तो हम लोगों का क्या होगा | देवराज के माथे पर चिंता की लकीरें अब साफ़-साफ़ देखी जा सकतीं थीं | उन्हें शायद अपना सिंहासन डोलता हुआ नज़र आ रहा था | काफी समय से उनकी दबी हुई भावनाएं आज जमकर बाहर आ रहीं थीं | अन्य देवतागण भी इस पर कुछ कहें यों कहकर वह बैठ गये |


देवराज का इशारा पाकर सर्वप्रथम अग्निदेव उठे | सबकी नज़रें उनकी तरफ उठ गयीं | अग्निदेव बोले- देवराज की चिंताएं अपनी जगह ठीक हों सकती हैं लेकिन मेरा मत है कि इन्सान हमेशा से कुछ नया करना चाहता है मगर हम देवता उसी एक लीक को पीटते रहते हैं | मुझे तो लगता है कि हमें इंसानों से कुछ सीखना चाहिए | अब माना के कलयुग है मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम अपनी जिंदगी को यूँ ही एकरस तरीके से बिता दें | देखिये अब ज्यादा घुमाफिराकर नहीं सीधा मुद्दे की बात कहता हूँ | इन्सान अपनी सुविधानुसार चीज़ों को बदलता रहता है मगर हम नहीं | मैंने चवालीस बार देवराज से कहा कि यहाँ देवलोक में ए.सी. लगवा दीजिये | मगर उनको अप्सराओं के नृत्य देखने से ही फुरसत नहीं मिलती | मारे गर्मीं के मेरा क्या हाल होता है मैं ही जानता हूँ |


अग्निदेव के आक्षेप से देवराज कुछ घबराये | उन्होंने उनसे बैठने का इशारा किया | अग्निदेव अपनी व्यथापुराण आगे बाँच पाते कि उनके बगल में बैठे वरुण देव बोल उठे- देवराज की बात मुझे ठीक मालूम होती है | यह मनुष्य अपने आप को समझते क्या हैं | वह आज स्क्रीन टच करते हैं, अपने से बड़ों के चरणस्पर्श नहीं, उन्हें पासवर्ड्स याद हैं अपने पड़ोसियों के चेहरे नहीं | उनके कमरों की दीवारों और कैलेंडरों में चलचित्र की अर्धनग्न नायिकाएं विराजती हैं हम जैसे देवतागण नहीं | उनके गमले में मनीप्लांट दिख जायेगा परन्तु तुलसी का पौधा नहीं | इन मानवों को अब बस लैपटॉप और टेबलेट प्यारा है, माँ की गोद नहीं | उन्हें पार्क में लगे हुए बनावटी फौहारों से प्यार है परन्तु गांव के तालाबों, नदी, पोखरों से नहीं | धरती पर आज लोग कुत्तों से प्यार करते हैं अपने बूढ़े पिता से नहीं | प्रियतमा की हर एक बात स्वीकार है इन गधों को लेकिन माँ की नसीहतें नहीं, रेस्टोरेंट में बीस रुपये की टिप दे देंगे लेकिन किसी भिखारी किसी ग़रीब के लिए इनके पास पैसे नहीं होंगे, नंगे-धड़ंग बच्चों की तस्वीरें हजारों-लाखों में बिकेंगी लेकिन उन्हें कपड़े पहना सके ऐसा कोई मनुष्य नहीं दीखता मुझे | काहे का और कौन से विकास की बात कह रहे है ? सारी सभ्यता और संस्कृति को तो आधुनिकता की चाशनी में घोलकर पी गयी है यह मानवजाति | अतः देवता होने के नाते हमारा कर्तव्य ही नहीं धर्म है कि हम उन्हें सही रास्ता दिखाएँ | मेरे खयाल से धरती पर कुछ विनाशलीला कर हम उन्हें सबक सिखा सकते हैं | 


इंद्र देव ने अपना माथा पीट लिया | वरुण देव की गाड़ी सधे तरीके से एकदम सही ट्रैक पर जा ही रही थी कि अंत में गलत स्टेशन के आउटर पर आकर पटरी से उतर गयी | उनके विनाश के आईडिये ने सब गुड़-गोबर कर दिया था |


सूर्य देव की व्यथा कुछ यूँ थी | वे बोले- गुस्ताखी माफ़ हो लेकिन परमपिता ने सत, रज और तम इन तीन गुणों के आधार पर मुख्य रूप से तीन जातियां बनाई थीं | देवता, मनुष्य और राक्षस | लेकिन आज धरती पर जिस गति से हत्या, अपहरण, लूटमार, बलात्कार आदि अपराध बढ़ रहे हैं | सारा ज्ञान सिर्फ किताबों में हैं | सही बातों और सच्चे धर्म को आचरण में उतारना तो दूर ये मानव उसे पढ़ना तक नहीं चाहते | धर्म का ठेका भी समाज के कुछ गिने-चुने ठेकेदारों के पास सुरक्षित है | मेरा तो खून खौलता है यह सब देखकर | समय तो यह आ गया है कि मनुष्य, मनुष्य का दुश्मन हुआ जाता है | इन्हें देखकर तो राक्षसों को भी शरम आ जाये | अब इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ...


सूर्यदेव की इतनी गंभीर बातों को सुनकर एकबारगी सभाकक्ष में सन्नाटा छा गया | कितनी जटिल समस्याएं और कितने विकट प्रश्न ??


देवियों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही माता लक्ष्मी जी आज अपनी चंचलता को छोड़कर गंभीर मुखमुद्रा में लग रहीं थीं | उन्होंने कहा कि मेरी सौ की सीधी एक बात यह है कि हम देवियाँ भी किसी बात में आप देवताओं से कम नहीं हैं अब चूँकि धरती पर स्त्रीविमर्श अपने चरम पर है तो भला हम इसमें पीछे कैसे रह सकती हैं | कान खोलकर सुन लें सभी देवतागण अब हम देवियाँ किसी का आदेश मानने पर विवश नहीं हैं | हम न ही किसी के पैर दबाएंगी न ही आपको स्वामी और स्वयं को दासी समझेंगी | हमें भी यहाँ सदियों से दबाया गया है लेकिन इन मनुष्यों की वजह से हमारी सुप्त हो चुकी चेतना जागृत हो चुकी है | उनकी तेजस्वी वाणी और एकदम स्पष्ट शब्दों में यह बात सुनकर सभी देवियाँ एक स्वर में बोल उठीं- तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, नहीं चलेगी | देवी एकता जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद | यह देखकर सभी देवता सकते में आ गये | स्थिति को आउट ऑफ़ कण्ट्रोल होते देखकर देवगुरु ब्रहस्पति ने बीच में आकर देवियों के ग्रुप को कुछ शांत रहने का संकेत किया तब जाकर मामला कुछ शांत पड़ा और सभा की कार्यवाही कुछ आगे बढ़ी |


कामदेव का नंबर आया तो वह अपनी तिरछी नज़र साइड में पंखा झलती हुई सुंदरियों पर डालते हुए ऐसे शुरू हुए मानो बहुत समय से भरे बैठे हों | वे बोले कि अब साहब धरती पर धर्म-कर्म बचा ही नहीं | इस ग्लोब्लाइजेशन और कंप्यूटर की बयार में हर कोई बहा चला जा रहा है | आज हर दूसरा आदमी ऑनलाइन और हर तीसरा आदमी व्यभिचारी है | मुझे कोई पूछता ही नहीं | इनके कंप्यूटर पर एक बार मेरी नज़र इनकी कामक्रीडाओं पर पड़ गयी तो मैं मारे शर्म के पानी-पानी हो गया | उफ्फ ! कुछ भी नहीं छोड़ा इन बेशर्मों ने | सचमुच बड़ी खतरनाक कौम है, राम बचाए इन मनुष्यों से |


यमराज जी से कहा गया कि वे अपनी बात रखें तो उन्होंने कहना शुरू किया | उनके पास अपनी खुद की इतनी समस्याएँ थीं कि उन्हें लिख कर लाना पड़ा था | चित्रगुप्त से शिकायतों का खर्रा अपने हाथों में लेकर उन्होंने पढ़ना शुरू किया | उनके इतने बड़े खर्रे को देखकर उस मीटिंग में उपस्थित सभी देवी-देवताओं के माथे पर बल पड़ गये | दरअसल ज्यादातर लोग बड़ा लम्बा-लम्बा बोल रहे थे और मीटिंग इतनी देर से चल रही थी कि लगभग सभी देवी-देवता ऊब गये थे | देवराज इंद्र ने यमदेव से अपना भाषण शोर्ट में रखने का संकेत किया | यमराज जी ने कहना शुरू किया- हे देवताओं मेरी बात ध्यान से सुन लीजिये | सबसे ज्यादा कष्ट तो हमीं को झेलना पड़ रहा है | द्वापर तक तो गनीमत थी परन्तु इस कलियुग के आ जाने के बाद से हमारे डिपार्टमेंट पर वर्कलोड बहुत ज्यादा बढ़ गया है | आप लोगों का क्या आप लोग तो यहाँ मौजमस्ती में जुटे रहते हो | मेरे मातहत किस तरह दिनरात काम करते हैं, वहां नरक में क्या हालात होते हैं हमीं जानते हैं | उधर धरती पर छठा वेतन आयोग लागू है और सातवें की घोषणा हो चुकी है और यहाँ मेरी सुख सुविधाओं में युगों से कोई इजाफा नहीं हुआ है | एन वक्त पर आज सवारी ने धोखा दे दिया तभी तो मैं इस मीटिंग में समय पर नहीं आ सका | यह भी कोई बात हुई बताइए ? अरे इतने दिनों में तो घूरे के दिन भी बहुरते हैं मगर यमराज होकर भी मुझे एक भी सुख नसीब नहीं | और तो और पृथ्वी पर चल रहे दलित विमर्श की देखादेखी यमदूत व अन्य सेवकगण भी आँखें दिखाने लगे हैं | तो इसलिए बहुत संक्षेप में मेरी दो छोटी सी मांगें हैं- पहली नरक की एच.आर. वकेंसी भरी जाये दूसरी मुझे मनुष्यों की तरह हाईस्पीड व औटोमैटिक सर्व सुखसुविधा संपन्न गाड़ी वाहन के तौर पर दी जाये | और हाँ जहाँ तक इस फेसबुक की बात है इसपे आप लोग मिलकर चाहें जो निर्णय लें हमारी उक्त दोनों शर्तों के पूर्ण होने की बिना पर हमें सब स्वीकार है |


अब बारी थी पवन देव की | उनके चेहरे का रंग कुछ उड़ा हुआ लग रहा था | गला खंखारते हुए उन्होंने कहना शुरू किया | आदरणीय देवियों और देवताओं मैं भी इस मनुष्य जाति से बड़ा परेशान हूँ | आज पृथ्वीलोक के हालात वास्तव में बड़े क्रिटिकल हैं | मेरा तो दम घुटता है वहां पर तो बीच बीच में ताज़ा होने ऊपर आ जाता हूँ | इंद्र देव की तरफ देखते हुए पवन देव ने आगे कहा- कभी अपने सिंहासन से उतरकर नीचे जाके तो देखिये, चारों तरफ इतना कूड़ा-कचरा इतना प्रदूषण है कि मियां एक क्षण न ठहर सकेंगे वहां | स्वर्गलोक की सारी आरामतलबी वहां जाकर भूल जाएगी | इन मनुष्यों पर तो जैसे अपना कोई वश ही नहीं रहा | प्राकृतिक संपदा का अधाधुंध दोहन हो रहा है, जंगल मैदान हो गये हैं, सारी नदियाँ कराह रहीं हैं | यह विषाक्त वातावरण अगर ऐसे ही बना रहा तो और कोई कुछ करे न करे लेकिन मैं कुछ ही दिनों में अवश्य ही अपनी सेवा से वीआरएस ले लूँगा, तब मत कहना | इन शोर्ट मुझे बस यही कहना था |


देवराज ने देवताओं की तरफ आँखें टेढ़ी करके देखा मानो कहना चाहते हों कि सभा ख़त्म होने दो फिर तुम सबसे निपटूंगा | वह सोच रहे थे कि यहाँ तो अपने साथी ही अपने साथ नहीं हैं | यह तो पासा उल्टा पड़ रहा है | खैर देखते हैं अब परमपिता क्या निर्णय लेते हैं |


सबकी नज़रें त्रिदेवों की तरफ उठ गयीं ! त्रिदेव विषय की गंभीरता को बखूबी समझ रहे थे | कुछ देर तक वे सोच में डूबे रहे फिर कुछ देर आपस में मंत्रणा की | देवतागण अधीर हो रहे थे कि क्या निर्णय होने वाला है ? कि तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने कहना शुरू किया |


वह बोले- हमने सबकी बातों/समस्याओं/तर्कों-वितर्कों को ध्यान से सुना है और बहुत सोच विचारकर सर्वसम्मति से यह निर्णय किया है कि सभी देवी देवता भी फेसबुक की आभासी दुनिया में घूमकर आयें और थोड़ा रिफ्रेश हो जाएँ | वे फ़ौरन फेसबुक पर अपनी आईडी बनाएं पर और अपनी घिसीपिटी लाइफ को चेंज कर किंचित आधुनिक हो जाएँ | इसमें कोई बुराई नहीं है | अतः हम देवराज इंद्र को यह आदेश देते हैं कि चौबीस घंटे के अन्दर सभी के लिए समस्त आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें | हर मौसम के लिए अलग अलग कपड़े, एसी, फ्रीज़, कंप्यूटर, मोबाइल आदि आवश्यक सभी सुविधाएँ | आप लोग बिलकुल भी चिंता न करें | यह सिर्फ एक प्रयोग मात्र है | इन्हें अपनाकर ही हम इनकी अच्छाई या बुराई जान सकते हैं | उसके बाद इन मनुष्यों का क्या करना है इसका फाइनल निर्णय अगली मीटिंग में होगा | यों कहकर त्रिदेव मुस्कुराये | समस्त देवी-देवताओं ने जो आज्ञा कहकर करतल ध्वनि से इस निर्णय का स्वागत किया और देवराज इंद्र के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह सभा विसर्जित हुई |


कुछ लोग खाने-पीने के चक्कर में मीटिंग ख़त्म होने के बाद भी अपने अपने आसन पर बैठे हुए थे | कुछ लोग खुश थे कुछ दुखी दिखाई दे रहे थे | कुछ लोग जा रहे थे तो कुछ लोग क्या हुआ...क्या हुआ यह पूछते हुए अब आ रहे थे |


खैर अब आप तो समझ ही गये होंगे कि अगली मीटिंग कब होगी, होगी भी या नहीं होगी बीकॉज़ फेसबुक इज द सेकंड लार्जेस्ट यूज्ड वर्ड स्टार्टिंग विथ एफ (समझदार और शरीफ़ लोग पहला वाला जान ही रहे होंगे) एंड लॉगआउट इज द हार्डस्ट बटन टू क्लिक !! इति !!!





परिचय और संपर्क

राहुल देव

संपर्क- 9/48 साहित्य सदन,
कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध),
सीतापुर (उ.प्र.)-261203
मो. 09454112975



मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014

'हवा में हस्ताक्षर' - कैलाश बाजपेयी के काव्य-संग्रह पर आशीष मिश्र की टिप्पणी




   



  आज सिताब दियारा ब्लॉग पर कैलाश बाजपेयी के कविता संग्रह डूबा-सा अनडूबा तारा 
              पर युवा अध्येता आशीष मिश्र की यह समीक्षात्मक टिप्पणी 

                                                                             
छोटी कविताओं में जरूरी नहीं है, कि आप कवि के रचना केंद्र से पूर्ण अवगत हो सकें या यह थोड़ा कठिन होगा । छोटी कविताओं में वह अपने रचनात्मक व्यक्तित्त्व के द्वन्द्वों पर परदा डालते हुए आपको सबकुछ अन्वितिपूर्ण, व्यवस्थित और निश्चित दिखा सकता है । अर्थात, यदि उसमें इतना आत्मबल न हो, कि वह अपने आत्म को यथारूप आपके सामने रख सके तो वह आपको बहला सकता है । पर वही कवि प्रबन्ध या प्रबंधात्मक कविता में यह ऐयारी नहीं कर सकता, हज़ार कोशिशों के बावजूद नहीं कर सकता । अगर कवि का रचनात्मक व्यक्तित्त्व अन्वितिपूर्ण नहीं है तो प्रबन्ध का अंजर-पंजर बजता हुआ और सबकुछ अपने चूल से सरका हुआ लगेगा। भारत में आधुनिकता की जड़ें जमने के बाद, हिन्दी साहित्य में प्रबंधात्मक कृतियों के सन्दर्भ में ऐसा सामान्यतः देखा जाता है । अगर कोई चाहे तो इन प्रबंधों की रूप-रचना को खंघालते हुए सभ्यता-समीक्षा की गहरी सीढ़ियाँ उतर सकता है । आज़ जब हमारा आत्म अनगिनत भाव-विचारों की युद्ध-भूमि बना हुआ है, जब हमें अपने सार के नाम पर एक-दूसरे के विरोधी उलझे विचार और चाहतें मिलती हैं तो ऐसे में सिर्फ़ सुन्दर-भविष्य के प्रति पक्षधरता और सर्जनात्मक हस्तक्षेप ही हमारे व्यक्तित्त्व को अन्विति प्रदान कर सकता है। यही वह प्रक्रिया है जो हमें चीज़ों का बण्डल बनने से बचा सकती है । यही वह भूमि है जहाँ से कोई जरूरी सृजन सम्भव होगा । वरना हम सारे मूल्यों, भावों और विचारों को गड्डमड्ड करने वाली वैश्वीकरण के नृशंस परियोजना का हिस्सा बन जाएँगे । हमें एक गहन वैचारिकता से इसका प्रतिरोध रचते हुए सामान्य जन की मूल्यधर्मी संवेदना से जुड़ना होगा । आज़ हमारे लिए जरूरी है, कि किसी कृति के भाव-बोध और रूप-रचना पर इस दृष्टि से भी विचार किया जाए ।
     
कैलाश वाजपेयी की जड़ें भारतीय संस्कृति और इसके मिथकों में बहुत गहरे तक पैठ रखती हैं । अगर इनकी कविताओं को देखें तो हमारी जातीय स्मृतियों से संवाद करती हुई काल के बारे में हमारे सामान्य बोध को तोड़ती रहती हैं । इससे कविताएं न सिर्फ़ जातीयता को नये ढ़ंग से अर्जित करने में सफल हैं बल्कि वे विविध अर्थ-छवियों से दीप्त भी हो उठती हैं । इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा सहयोगी इनकी भाषा है, जो समकालीन कविता में अलग से पहचानी जा सकती है । इस सबके बावजूद किसी व्यवस्थित वैचारिकी के अभाव में एक स्तर के बाद रचनाएँ बिखर जाती हैं । इसे सापेक्षतः लम्बी कविताओं या इनके प्रबन्धों में सबसे ज़्यादा महसूस किया जाता है । इसी तरह की रचना है डूबा-सा अनडूबा तारा। जिसे कवि धारावाही प्रबन्ध कहता है । धारावाही प्रबन्ध कहने का ठीक-ठीक क्या अर्थ है, बताना कठिन है । पर अन्य संदर्भों से इसका जो सामान्य भाव समझ में आता है वह शायद यह है , कि यहाँ प्रबन्ध के शास्त्रीय नियमों का पालन नहीं किया गया है । जो कि गलत नहीं है । कमियाँ और कहीं हैं ,गहरे अर्थों में रचनाकर-व्यक्तित्त्व में ।
     
इस प्रबन्ध में अश्वत्थामा और हिन्दू धर्म के चार प्रसिद्ध अश्वत्थ वृक्षों के मिथक को आधार बनाया गया है । फ़िर इन चार वृक्षों से कृष्ण, बुद्ध, शंकर और कबीर को जोड़ा गया है । पर इतने विस्तृत और विभिन्न देश-काल व नायकों के लिए जिस सघन स्थापत्य की आवश्यकता थी , वह कहीं नहीं दिखता ! भूमिका में कवि के संकल्प व प्रबन्ध की दिशा में कोई संबंध नहीं । शुरुआत में लगता है कि कवि भ्रूण-हत्या को विषय बना रहा है पर पूरे पाठ के बाद मिलेगा, कि अश्वत्थ के मिथक को स्थापित करते हुए प्रबन्ध कृष्ण, बुद्ध, शंकर और कबीर में बिखर गया है; जिसे ज़बर्दस्ती तान कर फैलाया गया अश्वत्थामा का मिथक थाम नहीं पा रहा है । महत्त्वाकांक्षा तो ज़्यादा है पर इसे मोम के पंख थाहा नहीं जा सकता था। इसके लिए जिस संवेदनात्मक और वैचारिक सूत्रता की आवश्यकता थी, वह सिरे से गायब है । शुरुआत में धृतराष्ट्र परेशान हैं, उन्हें नींद नहीं आ रही है ,वे विदुर से उपाय पूछते हैं। इस पर विदुर सबसे पहले अपना परिचय देते हैं-“मैं दासी-पुत्र /जन्मा दलित कोख से”। जैसे धृतराष्ट्र को विदुर के बारे में कुछ पता ही न हो ! पहले धृतराष्ट्र की मलामत करते हुए नींद को बेहद जरूरी सुन्दर चीज़ मानते हैं फ़िर मृत्यु का अभ्यास ,मृत्यु की सहेली, वंश-वृक्ष पर छैली बेल; सारी बातें उलझ गयी हैं ।

एक जगह नींद को ग्लोरीफ़ाई करते हैं तो दूसरी जगह लिखते हैं-“

नींद के गुलाम सिर्फ़ साधारण
जन ही नहीं
पशु,पेड़,चिड़िया,सभी जीवधारी
नींद के गुलाम हैं |  
                
जो चीज़ इतनी सुन्दर है उसके लिए यह कहना कि लोग उसके गुलाम हैं, गलत है ! जो लोगों को गुलाम बनाती है वो सुन्दर कैसे हो सकती है ! कविता ख़त्म होते न होते जीव-विज्ञान सम्बन्धी जानकारी और मुहावरों के रूप में एक मूल्य इस तरह चू पड़ा है, जिसका पूरी कविता से कोई संबंध नहीं-“

ऐसे भी जीव हैं दुनिया में
थोक में पड़े रहते हिम निद्रा में
सबसे बड़ा है वह आदमी
जो जागता सारी रात
कि अन्य सो सकें”।

इन पंक्तियों में भाषिक सर्जनात्मकता और कविता खोजने का प्रयास नहीं कर रहा हूँ । पूरी संरचना से संबंध ख़ोज रहा हूँ । वह भी नहीं है ! एक जगह जरा को उपदेश देते हुए कृष्ण कहते हैं-“

चाह कर न चाह कर
हर कोई हत्या ही करता है
********हर तरह की सत्ता का महल
हत्या की नींव पर खड़ा है
सिर्फ़ अनत्ता ही निरंजन है
********** बृंदा के गुण लोग आगे कभी जानेंगे
क्यों उकसाया झूठ के लिए सत्यवादी को(पार्थ के बहाने ही सही )
हत्या तो हत्या है     
तथाकथित तर्कशीलों के लिए”

अगली कविता में वे प्रेम को हत्या और आत्म हत्या कह देते हैं । संभवतः किसी ग्रंथ में, कृष्ण ने तो ऐसा नहीं कहा है । यह समझ कैलाश वाजपेयी जी की ही है- प्रेम हत्या और आत्म हत्या है! मिथक अमूल्य हैं जो हमारे चेतन-अवचेतन को निर्मित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं । हम इनकी पुनर्रचना और पुनर्पाठ से सामाजिक चेतना के संस्कार में योग दे सकते हैं पर उनका क्षयकारी उपयोग चैत्यिक अपराध है। थोड़ी देर बाद केशव (?) का नैतिक-बोध जागता है –“

अव्यक्त होने से पूर्व
व्यक्त रह कर वर्ष दर वर्ष
मैंने प्रयत्न किया युद्ध न हो
बना रहे सौमनस्य
शर्त है जो ज्ञानी कहलाने की”

केशव की इन दोनों बातों में से किस बात को सही माना जाए । हत्या स्वाभाविक है तो फ़िर सौमनस्य का प्रयत्न क्यों ? हत्या और हत्या में अन्तर करने वाले कर्मशीलों को किस बात का अपराधबोध है ! यह रचना इस तरह के अंतर्विरोधों से भरी पड़ी है । रचना का अन्त इस शुभाकांक्षा से होता है-
     
बोध, प्रीतिशोध, क्रोध
अब सब बेमानी
सिर्फ़ प्राथना भर
की जा सकती है
इस दुर्मद काल में
कोई अनाम पराचेतना आए
झकझोर कर
हमें जागा दे गहरी नींद से”
     
सारी नैतिकता और सौंदर्य का नकार, सबकुछ को धूधला करना,बोध,प्रतिशोध,क्रोध सबको बेमानी कहना ; इस अनाम परचेताना के अवतरण के लिए जगह बनाने का प्रयास था । पूरे टेक्स्ट को गहराई से पढ़ें परा चेतना की जगह पर पूँजी और फ़ासिज़्म मिलेगा । सारे विचार और प्रतिरोध को झूठा और धुधला इसलिए किया जा रहा है ताकि आप पूँजी-तंत्र के सामने हताश होकर नतमस्तक हो जाएँ । कृष्ण, बुद्ध, शंकर और कबीर के जीवन से कवि को अनाम पराचेतना का ज्ञान होता है ! ऐसा नहीं है , ख़ुद रचनाकार इनका चित्रण किसी परचेताना के रूप में नहीं करता; अपने बाह्य-आभ्यंतर संघर्षों से बोध को लब्ध होते दिखाता है । फ़िर इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचता है? इस अंतर्विरोध की जड़ें हमें रचनाकार-व्यक्तित्त्व में और उसके माध्यम से अपने समय-समाज में खोजना होगा ।
     
हिन्दी में ब्लर्ब लिखना स्तुति/संस्तुति हो चुका है । लिखने वाला सारी आलोचकीय नैतिकता को ताक पर रख देता है। इस पुस्तक का ब्लर्ब लिखते हुए सुशील सिद्धार्थ कैलाश वाजपेयी की भाषिक क्षमता की तारीफ़ करते हैं । उन्होने कितना ध्यान इस रचना की भाषा पर दिया है इसे वही जानें ! पहले ही पृष्ठ पर वाजपेयी जी का प्रयोग देखें-“मैं हूँ कोरा कायर”। कोरा कायर लिखना कोरा वाग्विलास है ! उसी पृष्ठ पर दूसरी जगह आदिवरी पद का प्रयोग करते हैं। आदीवारी शब्द फ़ारसी के दीवार शब्द में संस्कृत का उपसर्ग जोड़ कर बनाया गया है । सही शब्द होता है- बे-दीवार । ग़ालिब का शेर याद करें । एक दफ़े इस कौतुक को स्वीकार भी कर लिया जाए तो भी अदीवारी होगा न कि आदिवारी! एक अन्य स्थान पर लिखते हैं-“विस्फोट जैसा-सा हुआ मन के/आकश पर घन”। यह जैसा-सा क्या होता है ?या तो जैसा या फ़िर सा । अजब-अजब प्रयोग करते हैं-
     
पीपल के पत्ते खड़-खड़ कर रहे
जैसे बता रहे हों
जागो जनार्दन”
     
बताई जाती है कोई बात, जगाने में कुछ नहीं बताया जाता। पर, अगर भाषिक कौतुक ही ध्येय हो तो कुछ भी करते रहिए । ऐसी भाषिक सर्जनात्मकता और ऐसी दृष्टि कविताओं को हवा में हस्ताक्षर ही बनाएँगी।



पुस्तक का नाम:  डूबा-सा अनडूबा तारा                                                                                 
लेखक:          कैलाश वाजपेयी                                        
प्रकाशक :       भारतीय ज्ञानपीठ
मूल्य :        170      


समीक्षक
आशीष मिश्र