शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

रवीन्द्र के दास की कवितायें







रवीन्द्र के दास की कवितायें हमें अपने भीतर उतरने के लिए प्रेरित करती हैं | वहां, जहाँ से हम अपने आपको परखते हैं कि समाज में निगाह में अच्छा आदमी होने वाला मैं, क्या अपनी निगाह में भी वैसा ही दिखाई देता हूँ | मुझे लगता है कि किसी भी कविता की सबसे बड़ी सार्थकता यही होती है कि वह पाठक को अपने भीतर के आदमी से मिला दे |

                         
                           तो आईये पढ़ते हैं      


          आज सिताब दियारा ब्लॉग पर रवीन्द्र के दास की कवितायें
                                                     


बनाओ मुझसे नए खिलौने 


मिट्टी और मेरा रिश्ता 
वही नहीं है
जो कुम्हार का है
वह तो मिट्टी का सच 
जान गया है
वह कच्ची मिट्टी से बने बरतनों को 
हर बार कोशिश करता था 
पक्का करने का 
और हर बार यही कहता 
मिट्टी की किस्मत ! 

और मैं डरता था मिट्टी में मिलने से 
सो जरा सी मिट्टी छूते ही 
नहाता हूं खूब रगड रगड के 
गोया मैं नफ़रत करना चाहता हूं
मिट्टी से 
लेकिन न जाने क्या बात है
मिट्टी की उस गंध में 
कि मैं बेसुध खिंचा जाता हूं
उसकी ओर 

और तन्द्रा भंग होने पर सोचता हूं
राग ही मृत्यु है 
एक चक्र कि जीवन है तो राग है 
राग है तो मृत्यु 
और मृत्यु है ... नहीं, 
भय है तो तुम्हारी जरूरत है 
वही मेरे हिस्से का प्रेम है 

मिट्टी से अपना रिश्ता तोडूं तो 
जोडूं तो 
तुम बीच में रहना जरूर 
मैं मिट्टी से खेलने वाले कुम्हार को 
नहीं बनाना चाहता हूं साक्षी 
मैं साक्षी बनाना चाहता हूं तुम्हें 
कि गूंद कर मुझे 
बनाओ मुझसे नए खिलौने 
सुन्दर ... 
और उसे रखो कच्चा
आग में झुलसा पका कर 
मत करो पक्का 
पक्के रिश्ते दुःख देते है


विद्रूपता का कथन करना


विद्रूपता का कथन करना
खत्म कर देना

या विरोध करना नहीं है
विद्रूपता का ...
जरूरी है कि कुछ संभावना रहे
इनसे निजात पाने की
वरना खत्म हो जाएगा
जीने का अर्थ
खत्म हो जाएगी कविता

बची रहे कविता
और बचा रहे
जीने का अर्थ
कहीं से खोज लाओ उम्मीद
बेहतरी की
कि जी उठें होकर उम्मीदपरस्त



कवि की भाषा 


कवि की कोई भाषा अपनी नहीं होती
तो भी, कविता की होती है 
असहज और अनोखी 
जिसे सभी समझते हैं अपने बोध 
और अपनी सुविधा में कसकर समझता है 
इस तरह कविता हो जाती है 
बडबोली 
और कवि पराजित !

कवि हर बार सोचता है 
नहीं लिखूंगा इस बार कविता 
शब्दों में
नहीं बनाऊंगा शिकार अपनी कविताओं को 
शब्दाचारियों की हवस का 
किन्तु ऐसा हो नहीं पाता है 

धीरे धीरे उन कविताओं की बेजान जिस्मों को 
किया जाता है इकट्ठा 
जिन्हें समय समय पर किया गया था 
बेआबरू, शब्दकारोबारियों ने 
लगाया जाता है करीने से 
और तय की जाती है कवि की भाषा 

इस तरह,
जमाने में नहीं रह जाती है कोई कविता 
रह जाते हैं
कुछ जुमले
जिन्हें कवि की भाषा कहते हैं


जागते का कोई दुःस्वप्न


रास्ते पर उसने आडी तिरछी लकीरें खीचीं
वह लकीरें बना नहीं रहा था
फिर भी बनाईं
और अचानक चौंक उठा कि कहां से रिस रहा है खून
उसने हाथ पीछे झटक लिया
वैसे ही जैसे
मौत से बचने के लिए भागेगा 
कोई बेतहाशा

किसी अपराधी का दोस्त नहीं है वह
दुश्मन भी नहीं
पर कई अपराधों के किस्से जानता है वह
और मानता है कि कोई न कोई
एक कमरा रहता है 
सबके दिमाग में अपराध का
जब तक बन्द रहे, बन्द रहे
कमरे को पूरी तरह बन्द कर देने के बाद भी
आप आवाज़ों को बन्द नहीं कर सकते हैं
घुटी ही सही पर निकलेगी ज़रूर
कि आ जाती है तभी उसकी प्रेयसी
जिसकी प्रतीक्षा ने उससे खिंचवाई है 
आडी तिरछी लकीरें

उसे वह उसी नज़र से देखता है कि जैसे
उसीने वह बन्द कमरा
बिना उससे पूछे ही खोल दिया हो
चल पडता है उठकर,
जैसे अभी वह कमरा बन्द करने जा रहा हो
प्रेयसी का मनुहारी मुस्कुराना
चिढाने जैसा लगता है
तभी बज उठता है उसका फोन
हलो, भैया ! मेरा टेक्स्ट बुक लाना मत भूलना

बन्द हो जाता है वह कमरा अनायास
और पास खडी प्रेयसी
दिखती है प्रेयसी
गोया अभी टूटा हो जागते का कोई दुःस्वप्न


देह विदेह

दिखती रही देह
झुलसती रही देह
लडती रही देह
सडती रही देह
जीती रही देह
मरती रही देह ...
और हम 
उलझते रहते हैं
आत्मा की मुक्ति के 
सवाल पर


तुम्हारी बातें


तुम्हारी बातें
तब से हैं जब 
पैदा भी नहीं हुआ था सच
तुम्हारी बातें बेहतर है 
किसी भी सच से 
मंत्र से 
संविधान से 
मैंने सबको बेअसर होते देखा है 
नहीं होती बेअसर
तो तुम्हारी बातें ..


यह एक मुक्तिशाप था 


उफ़ान बहुत तेजी आता है 
सैलाब की तरह
जो भी देखता, 
उसीमें डूबने उतराने लगता 
मुझे यह कृत्रिम सा लगता है
मैं जब नहीं डूब पाता उसमें
साथ के लोग 
मुझे शक की निगाह से देखते
मुझपर शक करना 
खुद को सही साबित करने का इकलौता तर्क होता 
उनके पास
वे अपनी नज़र में गिरने से बचने के लिए 
मुझपर फ़ब्तियां कसते 
मुझे बडबोला, अहंकारी, आत्मश्लाघी आदि 
कहकर हांफ़ते थे ज़रूर
दरअसल वे मुझे नहीं 
वे अपनी व्यथा कथा कहते 
तो भी नतीजा मेरे हक में नहीं होता 

यह एक मुक्तिशाप था


सर्वनाम


कोई
खटखटाए जा रहा है
साँकल
खोल देता हूँ
दरवाज़ा
क्या हुआ
जो तुम न हुए
सर्वनाम को
बदलते
देर ही कितनी लगती है


अच्छे लोगों की जमात होती है 


अच्छे लोगों की जमात होती है 
एक पक्की जमात 
भीड में भी अच्छे लोग 
छांट लेते है अच्छे लोगों को 
ये लोग उन लोगों से, जो अच्छे लोग नहीं होते हैं
मिलते तो हैं
पर पानी पर तेल की सतह की मानिंद 
मिलते नहीं है 
तैरते रहते हैं ऊपर ही ऊपर 

अच्छे लोग 
बहुधा गोलबन्द होते हैं 
जब भी कोई अच्छा नहीं व्यक्ति 
उठाता है कोई सवाल 
सभी अच्छे लोग 
उस अच्छे नहीं को इतना बुरा कहते हैं
इतना बुरा कहते है 
कि अच्छे लोगों का 
अच्छा होना अक्षुण्ण रहता है 

अगर अच्छे लोग आपसे घुले मिले हैं
तो मुझे शक है
कि आप भी 
उन्हीं अच्छे लोगों में से एक हैं 
जिन अच्छे लोगों की जमात होती है



परिचय और संपर्क

नाम:      रवीन्द्र के दास

शिक्षा:     पी.एच.डी.
संप्रति:     अध्यापन 
जन्म तिथि: २८-४-१९६८
प्रकाशन:   'जब उठ जाता हूँ सतह से'[कविता-संकलन]
'सुनो समय जो कहता है' [संपादन, कविता संकलन]
'सुनो मेघ तुम' [मेघदूत का हिंदी काव्य रूपांतरण] और
'शंकराचार्य का समाज दर्शन'
जयपुर से निकलने वाली साहित्यिक मासिक पत्रिका उत्पल  के लिए सब्दहि सबद भया उजियारा नाम से कविता आलोचना विषय पर कॉलम लेखन.   
पत्रिकाओं आदि में कतिपय प्रकाशन.
                 
संपर्क: 77 डी, डीडीए फ्लैट्स, पॉकेट-1,
सैक्टर-10, द्वारका, नई दिल्ली- 110075

मोबाईल: 08447545320      
ई-मेल : dasravindrak@gmail.com 


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

फेसबुक पर ईश्वर - राहुल देव









आज सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा लेखक
राहुल देव की यह व्यंग्य रचना
                                               



                      फेसबुक पर ईश्वर



आज सुबह से ही स्वर्गलोक में हड़कंप मचा हुआ था | बहुत दिनों बाद देवराज इंद्र ने देवताओं की आपातकालीन बैठक बुलाई थी | किसी को भी बैठक के एजेंडा के बारे में कुछ नहीं पता था बस कहा गया, यह आपातस्थिति है | सब मीटिंग में ही बताया जायेगा | तुरत फुरत आडर निकलवाकर दसों दिशाओं में दूतों को दौड़ा दिया गया | विशिष्ट रूप से आमंत्रित अतिथियों को लाने का कार्यभार देवर्षि नारद को सौंपा गया | खैर नियत समय पर खचाखच भरे सभाकक्ष जहाँ अप्सराएँ नृत्य किया करतीं थीं, में मीटिंग शुरू हो रही थी | त्रिदेवों को बैठने के लिए विशिष्ट आसन दिए गये | मीटिंग बस शुरू होने ही वाली थी कि दौड़ते-भागते यमराज जी भी चित्रगुप्त के साथ हाँफते हुए आये | उनकी सवारी भैसे ने उन्हें आज एन वक़्त पर धोखा दे दिया था | अन्यान्य देवी-देवता भी अपनी-अपनी सीट पर बैठ चुके थे |


विषय प्रवर्तन करते हुए देवताओं के राजा इंद्र ने अपने आप को व्यवस्थित किया तत्पश्चात अपनी जंग खाई आवाज़ को बुलंद करते हुए कहना शुरू किया- “आदरणीय त्रिदेवों एवं सम्मानित देवी-देवताओं ! आप सब सोच रहे होंगे कि आखिर क्या बात आन पड़ी कि यह इमरजेंसी मीटिंग बुलानी पड़ी | दरअसल बात यह है कि आजकल इन नामाकूल इंसानों को पता नहीं क्या होता जा रहा है, वे हमारी प्रार्थना व पूजा-अर्चना की जगह ये किसी फेसबुक नामक अस्थायी दुनिया में ज्यादा समय व्यतीत करने लगे हैं | धरती के हालात बड़े नाजुक हैं | अतः अब इस बात को हल्के में लिया जाना बेवकूफी होगी | इंद्र ब्रह्मा जी की और मुखातिब होते हुए बोले- ब्रम्हा जी आप ही देखिये आपने मानसपुत्रों की करतूतें, आपने इतनी मेहनत से यह सृष्टि बनाई और आज इन मानवों की इतनी हिम्मत कि इन लोगों ने फेसबुक नामक अपनी एक अलग आभासी दुनिया ही बना डाली | और तो और यह मूर्ख मनुष्यजाति अब हमारा पूजा-पाठ भी अपनी इसी आभासी दुनिया में करना शुरू कर दिया है | न कोई फूल-माला, न मिष्ठान, न धूप, वहां हमारे चित्रों पर हमें मिलते हैं सिर्फ लाइक्स और कमेंट्स | श्रद्धा के नाम पर ये नालायक हमारा मज़ाक बना रहे हैं | शीघ्र ही कोई ठोस निर्णय न लिया गया तो हम देवों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा | इतना कहकर देवराज थोड़ी देर के लिए रुके |


सचमुच यह एक विकट और गंभीर प्रश्न था | पूरी सभा में सन्नाटा व्याप्त था | लग रहा था सभी इंद्र की बातों को बड़ा ध्यान लगाकर सुन रहे हैं | यमराज ने कोहनी मारकर सोते हुए चित्रगुप्त को जगाया | शायद नरक में कुछ काम बढ़ जाने के कारण वे ओवरटाइम कर रहे थे जिस कारण वे धरती लोक के नेताओं की तरह अपनी नींदें इस तरह की सभाओं में पूरी कर रहे थे | उधर देवराज इंद्र ने अपने भाषण का अगला अंश प्रस्तुत किया | यह फेसबुक किसी जुकरबर्ग नाम के शैतान खोपड़ी की उपज है | लोग उसकी आभासी दुनिया को अपनी असल दुनिया से बढ़कर समझने लगे हैं | उसकी देखादेखी कई अन्य मायावियों जैसे ट्विटर, जीप्लस, लिंक्डइन, व्हात्ट्सएप ने भी अपना जाल फैलाना शुरू कर दिया है | अगर इनका कारोबार ऐसे ही चलता रहा तो हम लोगों का क्या होगा | देवराज के माथे पर चिंता की लकीरें अब साफ़-साफ़ देखी जा सकतीं थीं | उन्हें शायद अपना सिंहासन डोलता हुआ नज़र आ रहा था | काफी समय से उनकी दबी हुई भावनाएं आज जमकर बाहर आ रहीं थीं | अन्य देवतागण भी इस पर कुछ कहें यों कहकर वह बैठ गये |


देवराज का इशारा पाकर सर्वप्रथम अग्निदेव उठे | सबकी नज़रें उनकी तरफ उठ गयीं | अग्निदेव बोले- देवराज की चिंताएं अपनी जगह ठीक हों सकती हैं लेकिन मेरा मत है कि इन्सान हमेशा से कुछ नया करना चाहता है मगर हम देवता उसी एक लीक को पीटते रहते हैं | मुझे तो लगता है कि हमें इंसानों से कुछ सीखना चाहिए | अब माना के कलयुग है मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम अपनी जिंदगी को यूँ ही एकरस तरीके से बिता दें | देखिये अब ज्यादा घुमाफिराकर नहीं सीधा मुद्दे की बात कहता हूँ | इन्सान अपनी सुविधानुसार चीज़ों को बदलता रहता है मगर हम नहीं | मैंने चवालीस बार देवराज से कहा कि यहाँ देवलोक में ए.सी. लगवा दीजिये | मगर उनको अप्सराओं के नृत्य देखने से ही फुरसत नहीं मिलती | मारे गर्मीं के मेरा क्या हाल होता है मैं ही जानता हूँ |


अग्निदेव के आक्षेप से देवराज कुछ घबराये | उन्होंने उनसे बैठने का इशारा किया | अग्निदेव अपनी व्यथापुराण आगे बाँच पाते कि उनके बगल में बैठे वरुण देव बोल उठे- देवराज की बात मुझे ठीक मालूम होती है | यह मनुष्य अपने आप को समझते क्या हैं | वह आज स्क्रीन टच करते हैं, अपने से बड़ों के चरणस्पर्श नहीं, उन्हें पासवर्ड्स याद हैं अपने पड़ोसियों के चेहरे नहीं | उनके कमरों की दीवारों और कैलेंडरों में चलचित्र की अर्धनग्न नायिकाएं विराजती हैं हम जैसे देवतागण नहीं | उनके गमले में मनीप्लांट दिख जायेगा परन्तु तुलसी का पौधा नहीं | इन मानवों को अब बस लैपटॉप और टेबलेट प्यारा है, माँ की गोद नहीं | उन्हें पार्क में लगे हुए बनावटी फौहारों से प्यार है परन्तु गांव के तालाबों, नदी, पोखरों से नहीं | धरती पर आज लोग कुत्तों से प्यार करते हैं अपने बूढ़े पिता से नहीं | प्रियतमा की हर एक बात स्वीकार है इन गधों को लेकिन माँ की नसीहतें नहीं, रेस्टोरेंट में बीस रुपये की टिप दे देंगे लेकिन किसी भिखारी किसी ग़रीब के लिए इनके पास पैसे नहीं होंगे, नंगे-धड़ंग बच्चों की तस्वीरें हजारों-लाखों में बिकेंगी लेकिन उन्हें कपड़े पहना सके ऐसा कोई मनुष्य नहीं दीखता मुझे | काहे का और कौन से विकास की बात कह रहे है ? सारी सभ्यता और संस्कृति को तो आधुनिकता की चाशनी में घोलकर पी गयी है यह मानवजाति | अतः देवता होने के नाते हमारा कर्तव्य ही नहीं धर्म है कि हम उन्हें सही रास्ता दिखाएँ | मेरे खयाल से धरती पर कुछ विनाशलीला कर हम उन्हें सबक सिखा सकते हैं | 


इंद्र देव ने अपना माथा पीट लिया | वरुण देव की गाड़ी सधे तरीके से एकदम सही ट्रैक पर जा ही रही थी कि अंत में गलत स्टेशन के आउटर पर आकर पटरी से उतर गयी | उनके विनाश के आईडिये ने सब गुड़-गोबर कर दिया था |


सूर्य देव की व्यथा कुछ यूँ थी | वे बोले- गुस्ताखी माफ़ हो लेकिन परमपिता ने सत, रज और तम इन तीन गुणों के आधार पर मुख्य रूप से तीन जातियां बनाई थीं | देवता, मनुष्य और राक्षस | लेकिन आज धरती पर जिस गति से हत्या, अपहरण, लूटमार, बलात्कार आदि अपराध बढ़ रहे हैं | सारा ज्ञान सिर्फ किताबों में हैं | सही बातों और सच्चे धर्म को आचरण में उतारना तो दूर ये मानव उसे पढ़ना तक नहीं चाहते | धर्म का ठेका भी समाज के कुछ गिने-चुने ठेकेदारों के पास सुरक्षित है | मेरा तो खून खौलता है यह सब देखकर | समय तो यह आ गया है कि मनुष्य, मनुष्य का दुश्मन हुआ जाता है | इन्हें देखकर तो राक्षसों को भी शरम आ जाये | अब इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ...


सूर्यदेव की इतनी गंभीर बातों को सुनकर एकबारगी सभाकक्ष में सन्नाटा छा गया | कितनी जटिल समस्याएं और कितने विकट प्रश्न ??


देवियों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रही माता लक्ष्मी जी आज अपनी चंचलता को छोड़कर गंभीर मुखमुद्रा में लग रहीं थीं | उन्होंने कहा कि मेरी सौ की सीधी एक बात यह है कि हम देवियाँ भी किसी बात में आप देवताओं से कम नहीं हैं अब चूँकि धरती पर स्त्रीविमर्श अपने चरम पर है तो भला हम इसमें पीछे कैसे रह सकती हैं | कान खोलकर सुन लें सभी देवतागण अब हम देवियाँ किसी का आदेश मानने पर विवश नहीं हैं | हम न ही किसी के पैर दबाएंगी न ही आपको स्वामी और स्वयं को दासी समझेंगी | हमें भी यहाँ सदियों से दबाया गया है लेकिन इन मनुष्यों की वजह से हमारी सुप्त हो चुकी चेतना जागृत हो चुकी है | उनकी तेजस्वी वाणी और एकदम स्पष्ट शब्दों में यह बात सुनकर सभी देवियाँ एक स्वर में बोल उठीं- तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, नहीं चलेगी | देवी एकता जिंदाबाद, जिंदाबाद, जिंदाबाद | यह देखकर सभी देवता सकते में आ गये | स्थिति को आउट ऑफ़ कण्ट्रोल होते देखकर देवगुरु ब्रहस्पति ने बीच में आकर देवियों के ग्रुप को कुछ शांत रहने का संकेत किया तब जाकर मामला कुछ शांत पड़ा और सभा की कार्यवाही कुछ आगे बढ़ी |


कामदेव का नंबर आया तो वह अपनी तिरछी नज़र साइड में पंखा झलती हुई सुंदरियों पर डालते हुए ऐसे शुरू हुए मानो बहुत समय से भरे बैठे हों | वे बोले कि अब साहब धरती पर धर्म-कर्म बचा ही नहीं | इस ग्लोब्लाइजेशन और कंप्यूटर की बयार में हर कोई बहा चला जा रहा है | आज हर दूसरा आदमी ऑनलाइन और हर तीसरा आदमी व्यभिचारी है | मुझे कोई पूछता ही नहीं | इनके कंप्यूटर पर एक बार मेरी नज़र इनकी कामक्रीडाओं पर पड़ गयी तो मैं मारे शर्म के पानी-पानी हो गया | उफ्फ ! कुछ भी नहीं छोड़ा इन बेशर्मों ने | सचमुच बड़ी खतरनाक कौम है, राम बचाए इन मनुष्यों से |


यमराज जी से कहा गया कि वे अपनी बात रखें तो उन्होंने कहना शुरू किया | उनके पास अपनी खुद की इतनी समस्याएँ थीं कि उन्हें लिख कर लाना पड़ा था | चित्रगुप्त से शिकायतों का खर्रा अपने हाथों में लेकर उन्होंने पढ़ना शुरू किया | उनके इतने बड़े खर्रे को देखकर उस मीटिंग में उपस्थित सभी देवी-देवताओं के माथे पर बल पड़ गये | दरअसल ज्यादातर लोग बड़ा लम्बा-लम्बा बोल रहे थे और मीटिंग इतनी देर से चल रही थी कि लगभग सभी देवी-देवता ऊब गये थे | देवराज इंद्र ने यमदेव से अपना भाषण शोर्ट में रखने का संकेत किया | यमराज जी ने कहना शुरू किया- हे देवताओं मेरी बात ध्यान से सुन लीजिये | सबसे ज्यादा कष्ट तो हमीं को झेलना पड़ रहा है | द्वापर तक तो गनीमत थी परन्तु इस कलियुग के आ जाने के बाद से हमारे डिपार्टमेंट पर वर्कलोड बहुत ज्यादा बढ़ गया है | आप लोगों का क्या आप लोग तो यहाँ मौजमस्ती में जुटे रहते हो | मेरे मातहत किस तरह दिनरात काम करते हैं, वहां नरक में क्या हालात होते हैं हमीं जानते हैं | उधर धरती पर छठा वेतन आयोग लागू है और सातवें की घोषणा हो चुकी है और यहाँ मेरी सुख सुविधाओं में युगों से कोई इजाफा नहीं हुआ है | एन वक्त पर आज सवारी ने धोखा दे दिया तभी तो मैं इस मीटिंग में समय पर नहीं आ सका | यह भी कोई बात हुई बताइए ? अरे इतने दिनों में तो घूरे के दिन भी बहुरते हैं मगर यमराज होकर भी मुझे एक भी सुख नसीब नहीं | और तो और पृथ्वी पर चल रहे दलित विमर्श की देखादेखी यमदूत व अन्य सेवकगण भी आँखें दिखाने लगे हैं | तो इसलिए बहुत संक्षेप में मेरी दो छोटी सी मांगें हैं- पहली नरक की एच.आर. वकेंसी भरी जाये दूसरी मुझे मनुष्यों की तरह हाईस्पीड व औटोमैटिक सर्व सुखसुविधा संपन्न गाड़ी वाहन के तौर पर दी जाये | और हाँ जहाँ तक इस फेसबुक की बात है इसपे आप लोग मिलकर चाहें जो निर्णय लें हमारी उक्त दोनों शर्तों के पूर्ण होने की बिना पर हमें सब स्वीकार है |


अब बारी थी पवन देव की | उनके चेहरे का रंग कुछ उड़ा हुआ लग रहा था | गला खंखारते हुए उन्होंने कहना शुरू किया | आदरणीय देवियों और देवताओं मैं भी इस मनुष्य जाति से बड़ा परेशान हूँ | आज पृथ्वीलोक के हालात वास्तव में बड़े क्रिटिकल हैं | मेरा तो दम घुटता है वहां पर तो बीच बीच में ताज़ा होने ऊपर आ जाता हूँ | इंद्र देव की तरफ देखते हुए पवन देव ने आगे कहा- कभी अपने सिंहासन से उतरकर नीचे जाके तो देखिये, चारों तरफ इतना कूड़ा-कचरा इतना प्रदूषण है कि मियां एक क्षण न ठहर सकेंगे वहां | स्वर्गलोक की सारी आरामतलबी वहां जाकर भूल जाएगी | इन मनुष्यों पर तो जैसे अपना कोई वश ही नहीं रहा | प्राकृतिक संपदा का अधाधुंध दोहन हो रहा है, जंगल मैदान हो गये हैं, सारी नदियाँ कराह रहीं हैं | यह विषाक्त वातावरण अगर ऐसे ही बना रहा तो और कोई कुछ करे न करे लेकिन मैं कुछ ही दिनों में अवश्य ही अपनी सेवा से वीआरएस ले लूँगा, तब मत कहना | इन शोर्ट मुझे बस यही कहना था |


देवराज ने देवताओं की तरफ आँखें टेढ़ी करके देखा मानो कहना चाहते हों कि सभा ख़त्म होने दो फिर तुम सबसे निपटूंगा | वह सोच रहे थे कि यहाँ तो अपने साथी ही अपने साथ नहीं हैं | यह तो पासा उल्टा पड़ रहा है | खैर देखते हैं अब परमपिता क्या निर्णय लेते हैं |


सबकी नज़रें त्रिदेवों की तरफ उठ गयीं ! त्रिदेव विषय की गंभीरता को बखूबी समझ रहे थे | कुछ देर तक वे सोच में डूबे रहे फिर कुछ देर आपस में मंत्रणा की | देवतागण अधीर हो रहे थे कि क्या निर्णय होने वाला है ? कि तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने कहना शुरू किया |


वह बोले- हमने सबकी बातों/समस्याओं/तर्कों-वितर्कों को ध्यान से सुना है और बहुत सोच विचारकर सर्वसम्मति से यह निर्णय किया है कि सभी देवी देवता भी फेसबुक की आभासी दुनिया में घूमकर आयें और थोड़ा रिफ्रेश हो जाएँ | वे फ़ौरन फेसबुक पर अपनी आईडी बनाएं पर और अपनी घिसीपिटी लाइफ को चेंज कर किंचित आधुनिक हो जाएँ | इसमें कोई बुराई नहीं है | अतः हम देवराज इंद्र को यह आदेश देते हैं कि चौबीस घंटे के अन्दर सभी के लिए समस्त आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें | हर मौसम के लिए अलग अलग कपड़े, एसी, फ्रीज़, कंप्यूटर, मोबाइल आदि आवश्यक सभी सुविधाएँ | आप लोग बिलकुल भी चिंता न करें | यह सिर्फ एक प्रयोग मात्र है | इन्हें अपनाकर ही हम इनकी अच्छाई या बुराई जान सकते हैं | उसके बाद इन मनुष्यों का क्या करना है इसका फाइनल निर्णय अगली मीटिंग में होगा | यों कहकर त्रिदेव मुस्कुराये | समस्त देवी-देवताओं ने जो आज्ञा कहकर करतल ध्वनि से इस निर्णय का स्वागत किया और देवराज इंद्र के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह सभा विसर्जित हुई |


कुछ लोग खाने-पीने के चक्कर में मीटिंग ख़त्म होने के बाद भी अपने अपने आसन पर बैठे हुए थे | कुछ लोग खुश थे कुछ दुखी दिखाई दे रहे थे | कुछ लोग जा रहे थे तो कुछ लोग क्या हुआ...क्या हुआ यह पूछते हुए अब आ रहे थे |


खैर अब आप तो समझ ही गये होंगे कि अगली मीटिंग कब होगी, होगी भी या नहीं होगी बीकॉज़ फेसबुक इज द सेकंड लार्जेस्ट यूज्ड वर्ड स्टार्टिंग विथ एफ (समझदार और शरीफ़ लोग पहला वाला जान ही रहे होंगे) एंड लॉगआउट इज द हार्डस्ट बटन टू क्लिक !! इति !!!





परिचय और संपर्क

राहुल देव

संपर्क- 9/48 साहित्य सदन,
कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद (अवध),
सीतापुर (उ.प्र.)-261203
मो. 09454112975