रविवार, 21 सितंबर 2014

“ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की छठी क़िस्त - 'अशोक आज़मी’







इस संस्मरण के बहानेअशोक आज़मीअपने अतीत के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होने मंडल आन्दोलन के बहाने उस पूरे दौर की मानसिकता को समझने की कोशिश की थी | इस छठी क़िस्त में अपने जेल के अनुभवों के सहारे वे उसे और विस्तार दे रहे हैं
                                 
                                  
      
         तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               

                    “ग़ालिब--ख़स्ता के बगैर की  छठी क़िस्त


                       या देवी सर्वभूतेषु



किसी भी शहर या कस्बे में जेल हमेशा शहर के बाहर होती है. शरीफ लोग जेल से दूर ही रहना पसंद करते हैं. पहली जेलयात्रा के बाद से अब तक जेलें बहुत सी देखीं हैं मैंने. ग्वालियर में किले पर कभी जाएँ तो वहाँ मानमहल है. राजा मान सिंह ने बनवाया था उसे जिनके बारे में कहा जाता है कि वह न केवल बहुत वीर थे बल्कि कलाओं, ख़ासकर संगीत में निपुण थे. ध्रुपद के अच्छे गायक थे और इस विधा को उन्होंने ही सबसे पहले राज्याश्रय दिया. इस महल की दो मंज़िलें ज़मीन के ऊपर हैं और बाक़ी (शायद पाँच) ज़मीन के नीचे. इन्हीं में से एक मंजिल में एक वृत्ताकार हाल है. बताते हैं कि राजा मान सिंह के राज में उनकी सात रानियाँ उसमें झूला डाल के झूलती थीं. उसके नीचे एक तालाब बना था. चारों ओर जबरदस्त सुरक्षा. फिर जब उन्होंने मृगनयनी से शादी की तो उसने वहाँ रहने से इंकार क्यों किया होगा? उसने अलग और खुला महल बनाने की मांग क्यों की होगी? वही जगह मुग़ल शासकों को बाद में जेल बनाने के लिए सबसे मुफ़ीद क्यों लगी होगी? बताते हैं मुगलों ने न सिर्फ उसे जेल बना दिया बल्कि ज़्यादातर राजद्रोह के अपराधियों को वहीँ रखा. सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह को जहांगीर ने यहाँ तमाम दूसरे राजाओं के साथ बंदी बनाकर रखा था. बाद में जब वह रिहा किये गए तो उनके साथ के राजाओं ने उन्हें साथ ले चलने की फ़रियाद की. जहांगीर ने कहा कि जितने राजा दामन पकड़ के आ सकते हैं गुरु का उन्हें ही रिहा किया जाएगा. रात भर थिगलियाँ जोड़ी गयीं और फिर उनका दामन पकड़कर 52 राजा निकल आये थे. किले पर इसी घटना के स्मृति में एक खूबसूरत गुरुद्वारा है जिसे “दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा” कहा जाता है. मान महल के भीतर अब भी वह गोल बारामदा भुतहा सा लगता है. जैसे उन क़ैदियों की कराहें गूँज रही हो उसमें.


एक जेल मुंगावली में देखी थी. खुली ज़ेल. जनता शासन के दौरान यह प्रयोग किया गया था. दीवारें नहीं थीं उसमें. क़ैदी स्वच्छंद घुमते थे. उन्हें तमाम शिल्प कलाएं सिखाई जाती थीं कि अपराध छोड़कर वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. लेकिन यह प्रयोग असफल हुआ. कई बार वक़्त से पहले आदर्शवादी तरीक़े से लागू कर दी गयी चीज़ें असफल होने के लिए अभिशप्त होती ही हैं. अब वहां खंडहर हैं उस आदर्शवादी स्वप्न के. उसी मुंगावली की असली वाली जेल में गणेश शंकर विद्यार्थी की वह मूर्ति वर्षों क़ैद रही जिसे वहां के पत्रकार चौराहे पर लगाना चाहते थे. विद्यार्थी जी का रिश्ता रहा था उस क़स्बे से सो आज़ादी के बाद उनकी मूर्ति गिरफ़्तार हुई वहाँ.


खैर, विषयांतर कर बैठा. माफ़ी चाहूँगा. हमारे पहले कोई पचीसेक लोग गिरफ्तारी दे चुके थे. इनमें से ज़्यादातर छुटभैये नेता और डिग्री कालेज के छात्रनेता थे जिन्हें जेलों का अच्छा खासा अनुभव था. हम उनके बीच बच्चे ही थे. मैं तो सबसे कम उम्र का था. अन्दर चले तो गए पर एक डर मन में था. जेल को लेकर एक छवि बनी हुई थी. लेकिन उस जेल में तो हम जैसे अतिथि थे. वहां तो उत्सव का माहौल था. शहर के सबसे अमीर सुनार और संघ के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता रामा बाबू के यहाँ से रोज़ सुबह जलेबियों, समोसों, कचौड़ियों वगैरह का नाश्ता आता. एक कांग्रेसी नेता थे जिनके यहाँ से शाम का नाश्ता आता था. जनता दल की तो युवा शाखा के तमाम बड़े नेता जेल में थे ही. जेलर साहब अक्सर टहलते हुए चले जाते और हमारे सुर में सुर मिला कर आरक्षण की आलोचना करते. दिन भर पत्रकारों का आना जाना लगा रहता और हम सबकी तस्वीरें अगले दिन सुबह देवरिया के पन्ने पर छपतीं. शाम का खाना सबकी तरह मेरा भी घर से आया लेकिन उसके पहले किसी के सौजन्य से पूड़ी सब्ज़ी आ चुकी थी.


पापा को ख़बर मिली श्रीधर भैया से. वह हमारे नए पड़ोसी थे. राम गुलाम टोले के पीछे के खाली मैदान में बसे इस नए मोहल्ले में अभी कम लोग आये थे और सबसे पुराना बाशिंदा होने के कारण पापा का विशेष सम्मान था. जब कोई नया घर बनता तो पानी, चाय वगैरह की व्यवस्था हमारे ही घर से होती. श्रीधर भैया का बचपन कलकत्ता में गुज़रा था और अब उन लोगों ने यहाँ मकान बनवाया था जिसमें चाची जी और भैया रहते थे. चाची की उम्र काफी थी लेकिन ग़ज़ब की मेहनती थीं. अकेले दम पर पीछे की कोई दो कट्ठा ज़मीन में सब्ज़ी उगातीं. चाचा जी से उनकी बोलचाल नहीं थीं. लोग बताते थे कि श्रीधर भैया की एक बहन ने अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली थी जिसका सारा गुस्सा चाचा जी ने चाची पर निकाला था. उनकी भाषा में बंगाली और भोजपुरी का ग़ज़ब मिश्रण था. कलकत्ते में रहने के कारण एक तरह का श्रेष्ठता बोध था उनमें. हमसे कहतीं, कलकत्ता में न एक ठो बहुते बड़ा चिरैयाखाना है. बजार तो इतना बड़ा है कि दू ठो देवरिया आ जाए उसमें. उहाँ की आलमारी में सात आठ सौ साड़ी पड़ा है हमारा. ला ही नहीं पाए.” श्रीधर भैया उनकी इकलौती संतान थे. उस दिन जेल भरो आन्दोलन में वह भी साथ गए थे लेकिन इन्स्पेक्टर साहब के समझाने पर समझ कर लौट गए थे. पापा को ख़बर मिली तो सीधे जेल आये. मुझे बुलावा आया मिलने का तो रूह सूख गयी. किसी तरह पहुँचा. पहला सवाल आया, जब सब लड़के वापस लौट गए तो तुम क्यों नहीं लौट आये? मैंने कहा, “ मैं नेतृत्व कर रहा था उस दिन, मैं कैसे पीछे हटता?” याद नहीं उन्होंने और क्या-क्या पूछा था और मैंने क्या बताया था, लेकिन जो भी था वह उतना बुरा नहीं था जितनी मैंने कल्पनाएँ की थीं.


रात हुई तो नेताजी लोगों की बाक़ी व्यवस्थाएं भी हो गयीं. सिगरेट तो सुबह से चल रही थी, अब दारू भी आ गयी थी. दो पैग अन्दर गए तो उनके भीतर के असली अमानुष बाहर आने लगे. उस उम्र में तो मैं सिगरेट के धुंए से भी दूर रहता था शराब पीते तो शायद जीवन में पहली बार किसी को साक्षात देखा था. उसके बाद के अश्लील गाने और बातें! उफ़ रूह काँप गयी थी. यही लोग थे जो मंच पर भाषण देते थे. जो ग़रीबों और युवाओं के नाम पर इतनी बड़ी बातें करते थे. बात बात में लोहिया-जयप्रकाश को कोट करते थे. वे मुझे अपने जैसा मान के चल रहे थे. जब सिगरेट बढ़ाई गयी हमारी ओर तो उसे “ख़तना” ही कहा गया. लेकिन मैं मन ही मन तय कर रहा था. मुझे इनमें से एक नहीं होना है.


अगली सुबह पापा जमानत के लिए दौड़ भाग करते रहे. उनके एक दोस्त थे वकील तो जमानत का इंतजाम उन्हीं के भरोसे था. लेकिन सब करते कराते शाम हो गयी और अब जमानत अगले ही दिन मिल सकती थी. एक और रात मुझे जेल में काटनी थी. शाम को जब महफ़िल जमने वाली थी तभी जेलर साहब आ गए. हमें देख के बोले “अभी से शुरू कर दिए पंडिज्जी?” हमने कहा “नहीं सर. मैं शराब नहीं पीता.” तो बोले चलो असली जेल दिखा के लाते हैं आपको. मैं उनके पीछे पीछे लग गया. मेरे साथ जो एक और लड़का गिरफ्तारी देके आया था एस एस बी एल का वह पहले ही दिन ख़ुशी ख़ुशी खतना और बप्तिस्मा दोनों करा चुका था. बाद में वह छात्रनेता ही बना. अंतिम मुलाक़ात उससे मेरी कोई दस साल पहले हुई थी जब मैं अपने एक रिश्तेदार से मिलने पहली और आखिरी बाद लखनऊ के विधानसभा मार्ग पर स्थित भाजपा के दफ्तर गया था. खैर, जेलर साहब मुझे लेकर जेल के तमाम हिस्से घुमाते रहे. हत्या के आरोप में गिरफ्तार एक खूंखार अपराधी को मैंने देखा जो सारी सारी रात भजन करता था और रोता था. एक डकैत को देखा जिसकी अगले हफ्ते रिहाई होनी थी और वह परेशान था कि दो महीने से कोई उसके घर से मिलने भी नहीं आया था. एक वार्ड में ढेर सारे लोग थे. कोई जेबकतरा था, कोई छोटी मोटी चोरी करके आया था, कोई छिनैती में, कोई मार पीट में. ये लोग ऐसे खेल कूद रहे थे जैसे अपने गाँव में हों. उन्हीं में एक लड़का था जो बिना टिकट यात्रा में पकड़ा गया था और तीन महीने बीतने के बावजूद जमानत नहीं हुई थी. मैंने कुर्ता जींस पहना हुआ था और जेलर के साथ बोलते बतियाते देख के उसने मुझे कोई नेता समझा. वह पैर पकड़ कर रोने लगा, “हमके छोड़ा देईं ए नेताजी. एक्को पइसा नाही रहे ओ दिन. रिस्तेदारी में मर गइल रहे केऊ. माई मरी जाई हमरे बिना. हमके छोड़ा लेईं. राउर गोड लाग तानी. राउर गुलामी करब...” मेरी कुछ समझ में नहीं आया. मैंने लाचारगी की निगाह से जेलर साहब को देखा. उन्होंने मेरा पैर छुड़ाया और बोले, “चलिए.”


अगले दिन मेरी जमानत हो गयी. पापा स्कूटर से लिवाने आये थे. रास्ते भर कुछ नहीं बोले. घर पहुँचा तो माँ से बोले, “लीजिये आ गए आपके सपूत. अब खीर पूड़ी खिलाइए और स्वागत कीजिए.” मम्मी का रो रो के बुरा हाल था. नाना, मौसी और जाने कौन कौन घर पर जमा था. सब मुझे कुछ न कुछ उपदेश दे देना चाहते थे. मैं चुपचाप भीतर गया और खुद को कमरे में बंद कर लिया. कोई घंटे भर बाद पापा आये. सामने कुर्सी पर वह थे और बेड पर मैं. थोड़ी देर यों ही बैठे रहे. फिर कहा, “यही सब करना चाहते हो जीवन में? इतना तेज़ दिमाग है. इतना दुनिया भर का पढ़ते लिखते रहते हो यह नहीं समझ पाते कि कच्ची मिट्टी दीवार में नहीं लगती. नेतागिरी करनी है तो इन लफंगों जैसा नेता बनके क्या मिलेगा? नेहरु हों, इंदिरा हों, लोहिया हों..ये सब बहुत पढ़े लिखे लोग थे. पढ़ लिख लो. डिग्री ले लो. चीजों को खुद समझो. फिर जो करना है करो.” जीवन में पहली बार पापा इतनी शान्ति से समझा रहे थे. शायद उन्हें मेरे बड़े होने का अहसास हो रहा था. मैंने एक शब्द कहा बस “जी.” वह उठ खड़े हुए और कहा, कल पूजा है. तैयारी कर लो. बोर्ड है इस साल. लौट के बात करते हैं.


पूजा यानी सरयू नदी के किनारे बसे हमारे गाँव सुग्गी चौरी की सालाना पूजा. दुर्गा हमारी कुलदेवी मानी जाती हैं. हालांकि मुझे लगता है कि ये जो दुर्गा रही होंगी वह दुर्गा के प्रचलित मिथक से अलग कोई स्थानीय देवी रही होंगी जिन्हें कालान्तर में दुर्गा बना दिया गया. दशहरे के आस पास यह पूजा होती थी जिसमें दो बेदाग़ बकरों की बलि दी जाती थी. बेदाग़ यानी काला तो सफ़ेद की एक चित्ती नहीं चलेगी और सफ़ेद तो कोई काला धब्बा नहीं होना चाहिए. बाबा और छोटे चाचा ऐसे दो बकरों का इंतजाम करके रखते. बड़े चाचा लखनऊ में थे, मंझले चाचा एयर फ़ोर्स में हैं तो उनकी जगह बदलती रहती, एक और चाचा हैं जो अब तो गाँव पर बस गए हैं लेकिन जाने कहाँ कहाँ रहे और कौन कौन सा गुल खिलाया. पूजा में सारा परिवार जुटता. बलि देने वाले का चयन जन्म से पहले ही हो जाता. उसे सेवईक कहा जाता था. मेरी पीढ़ी में मुझे सेवईक चुना गया था. बड़े चाचा और वह मस्त मौला चाचा भी सेवईक थे लेकिन अपनी एक बीमारी की वजह से बड़े चाचा ने छोड़ दिया था और मझले चाचा की पत्नी ने शादी के तुरत बाद उन्हें क़सम दिला दी थी तो वह भी किनारा कस चुके थे. तो अब जिम्मेदारी हम पर थी. घर के आँगन में सब लोग इकट्ठा होते. औरतें एक तरफ आड़ में और पुरुष सिर्फ धोती में आँगन के निचले हिस्से में. (चारों तरफ आँगन ऊंचा था और बीच में एक चौकोर तालाब जैसी सरंचना बना दी गयी थी जो मुख्य आँगन था) पहले हवन और मंत्रोच्चार होता. शुद्ध देशी घी में सने हविष्य के साथ “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” का स्वर लगातार ऊँचा होता जाता. फिर दो तीन लोग एक एक कर बकरे को पकड़ के लाते. जै हो दुर्गा मईया का नारा लगता. लकड़ी के एक बलि खंड पर उसे रखा जाता और सेवइक को गंडासे के एक वार से उसका सर धड़ से अलग करना होता. धड़ हटा दिया जाता और प्रसाद के रूप में रखे रोट (घी में सिंकी रोटी), चने और बताशे की थाली के बगल में सिर रख दिया जाता. दूसरे बकरे के साथ भी यही क्रिया दुहराई जाती. फिर सेवइक खून से सने कपड़ों में घुटने के बल बैठकर देवी का आह्वान करता और देवी उसके “सिर” पर आतीं. परकाया प्रवेश जैसा. फिर सारे घर के लोग पैरों में गिरते. अपनी अपनी समस्या पूछते. थोड़ी देर तक साथ रहने के बाद वह चली जातीं. देवी संस्कृत या हिंदी में नहीं शुद्ध भोजपुरी में बतिआतीं थीं. देवी के जाने के बाद सेवइक निढाल होकर गिर जाता. उसकी सेवा की जाती, नहलाया जाता, चाय पिलाई जाती तब जाके वह सामान्य हो पाता था.  फिर बकरों का मीट पकता. गाँव के लोगों में यह प्रसाद बाँट दिया जाता. घरवाले और पट्टीदार एक साथ खाते. सिर अलग से पकता. उस पर सिर्फ घरवालों और सेवइक का हक होता.


सबकुछ इतना हिंसक और रौद्र होता कि अब सोचता हूँ तो सिहरन होती है. इस भयावहता का अनुमान एक किस्से से लगाया जा सकता है. जिन अलमस्त चाचा का ज़िक्र किया मैंने उनकी शादी के बाद एक पूजा हुई. चाची जिस घर से आईं थीं वहां लहसन प्याज तक वर्जित था. विदाई के तीसरे दिन यह पूजा हुई. उन्हें भनक मिल गयी थी तो चाचा को तो खैर कसम दिला दी गयी थी और पूजा पर बैठे हम. रंग रूप तो जो हमारा है खैर वह है ही, उस दिन खून से सनी सफ़ेद धोती में मंत्रोच्चार करते, देवी के रूप में घर के लोगों को डांटते-हड़काते और झूमते जो उन्होंने मुझे देखा तो ऐसी खौफज़दा हुईं कि वर्षों ठीक से बात तक नहीं कर पाई. अब भी एक डर और झिझक उनकी आवाज़ में रहती ही है मेरे सामने.


जब कम्युनिस्टों से पहला पाला पड़ा और बात ईश्वर के अस्तित्व तक पहुँची तो मेरे पास सबसे मज़बूत तर्क इसी अनुभव का था. वह क़िस्सा आगे आएगा. अभी तो पूजा के बाद देवरिया लौटना था और बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं का सामना करना था.  


हाँ, देवरिया लौटकर मैंने उस लड़के की जमानत करा दी थी.
  

                                                                     ....................जारी है .....
                                      

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी      




रविवार, 14 सितंबर 2014

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर - अशोक आजमी - पांचवी क़िस्त





इस संस्मरण के बहाने ‘अशोक आज़मी’ अपने बचपन के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होंने किशोरावस्था के उन वर्जित प्रदेशों की यात्रा की थी, जिसके बारे में हमारा समाज न तो कुछ कहना चाहता है और न ही सुनना | इस पांचवी क़िस्त में वे मंडल आन्दोलन के बहाने उस पूरे दौर की मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहे हैं | 
                                  
      
    तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               

               “ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की पांचवी क़िस्त

             

          “जब नौकरी मिलनी ही नहीं है तो पढ़ के क्या फ़ायदा”



शिशु मंदिर में एक दैनन्दिनी दी जाती थी. इस डायरी के पहले पन्ने पर नाम वगैरह के साथ एक सवाल था “बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं’ मैंने लिखा था “एम एल ए, एम पी फिर प्रधानमन्त्री!” यह पांचवी क्लास का हाल था!


राजनीति में मेरी रूचि जाने क्यों आम लड़कों की तुलना में शुरू से कहीं अधिक थी. राजीव गांधी जब देवरिया आये थे तो पापा बीमार थे. माँ ने दवाई लाने भेजा था और हम साइकिल लिए लिए उनका भाषण सुनने चले गए. उनका वह कांख के नीचे से निकाल कर शाल ओढ़ने वाला स्टाइल इतना भाया कि मम्मी की एक क्रीम शाल उसी स्टाइल में ओढ़ कर कहीं निकल जाता था. एक बार अटल बिहारी बाजपेयी रामलीला मैदान में आये तो वहाँ पहुँच गया और उनकी पाज देकर बोलने वाली स्टाइल अपनाने की कई असफल कोशिशें कीं. हमारे मकान मालिक रिटायरमेंट के बाद नगरपालिका सदस्य का चुनाव लडे तो रिक्शे पर बैठकर माइक लेकर प्रचार करने निकल जाता “आदरणीय भाइयों और बहनों, नगरपालिका परिषद् देवरिया के वार्ड 17 के सदस्य पद प्रत्याशी श्री पारस नाथ श्रीवास्तव को मछली पर मुहर लगा के विजयी बनाएं. याद रहे भाइयों और बहनों..मछली. मछली.मछली. आप सबका चुनाव निशान मछली.


अख़बारों में राजनीतिक ख़बरें भी बहुत गौर से पढता था. तब हमारे यहाँ जनसत्ता और आज आते थे. इसके कारण शायद उस दौर के राजनीतिक हालात में रहे होंगे. राजीव गांधी का इंदिरा जी की मृत्यु के बाद एक स्वप्नदर्शी युवा के रूप में उभरना, संचार क्रान्ति का आरम्भ वगैरह जो एक उत्साह लेकर आया था उसके तुरंत बाद बोफर्स का मामला क्या उठा, एक तूफ़ान खड़ा हो गया.  वी पी सिंह अचानक देश में मसीहा की तरह स्थापित हो गए. हम पगला गए थे उस दौर में. अभी पहले रोएँ चेहरे पर आना शुरू हुए थे लेकिन जहाँ कहीं सभा होती पहुँच जाते. उनका आफसेट पर छपा एक पोस्टर अपने घर के बाहर वाले खम्भे पर चिपका दिया. पापा वी पी सिंह को पसंद करते थे लेकिन मेरी इस दीवानगी से चिंतित भी रहते थे. तो पढ़ाई पर जोर बढ़ा दिया गया. सुबह पांच बजे उठा के कुर्सी पर बैठा देते थे, एक कप चाय खुद बना के देते थे और फिर स्कूल से आने के बाद चार से पांच घंटे रोज़. घर से निकलना मुश्किल हो गया था. लेकिन उस दिन तो हमारा मसीहा शहर में आने वाला था.


उनकी मीटिंग शाम छः बजे से थी. मैं कालेज से घर गया ही नहीं. प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी थी. रामलीला मैदान में होने वाली सभा कैंसिल कर दी गयी और  आखिरी समय पर हमारे राजकीय इंटर कालेज का मैदान दिया गया. नारा लगा “ बोफर्स के दलाल मुर्दाबाद”, “तानाशाही नहीं चलेगी”, “राजा नहीं फ़क़ीर है, भारत की तक़दीर है” और इन नारों के साथ हम राजकीय इंटर कालेज के मैदान में पहुँचे. कोई पांच सौ लोगों की भीड़ थी तब तक. कुछ लोगों को रिक्शे पर लगे माइकों के साथ जगह बदलने की सूचना के साथ शहर की गलियों और मुहल्लों में भेजा गया. बाक़ी लोग व्यवस्था में लगे. सबसे बड़ी समस्या थी मंच की. कालेज का मैदान खेल का मैदान था. वहाँ कोई राजनीतिक सभा होती ही नहीं थी तो कोई स्थाई मंच था नहीं. जितनी भीड़ की उम्मीद थी उनके बीच जीप वगैरह पर खड़े होकर बोलने से काम चलने वाला नहीं था. इसी बीच सलाह आई कि ट्राली जोड़ के मंच बन सकता है. आनन फानन में दो ट्रैक्टर ट्राली मंगवाए गए. लेकिन पुलिस ने कालेज गेट पर उन्हें रुकवा दिया. बड़ी हुज्जत की नेता लोगों ने. लेकिन पुलिस वाले टस से मस न हुए. बोले “ट्राली ले जाओ लेकिन ट्रैक्टर नहीं ले जाने देंगे.” अब बिना ट्रैक्टर ट्राली कैसे टस से मस हो. किसी ने उत्साह में नारा लगाया, खींच के ले चलो. नेताजी लोग सहम गए. सफ़ेद झकाझक कुर्ता पैजामा में ट्राली कैसे खिंचाती. चार पांच युवा आगे बढ़े..पीछे से मैं और मेरे जैसे कुछ और विद्यार्थी और देखते देखते दो ट्रालियां जोड़ के मंच बना. गद्दे बिछा दिए गए. शाम के छः बजे...फिर सात...आठ...वी पी सिंह नौ बजे आये महिन्द्रा जीप से. कालेज का छोटा सा मैदान पेट्रोमेक्स की रौशनी में लोगों से ठसाठस भरा था. वी पी सिंह की एक झलक पाने के लिए लोग बेक़रार थे. हम मंच सजाने के बाद वहीँ रह गए थे...कब धक्के लगे और कब मंच नेताओं से भर गया पता ही नहीं चला. हम नीचे खड़े थे. वी पी सिंह बगल से गुज़रे. मैंने नमस्कार किया तो लगा उन्होंने जो हाथ जोड़ा था वह मेरे ही जवाब में था. नारे और बुलंद हो गए. जहाँ वह खड़े थे वहां से उनकी छाया मुझ पर पड रही थी. दुबला पतला शरीर और मुचमुचाया कुर्ता पैजामा. गले में गमछा. पूरबिहा लोच वाली सधी आवाज़. लगा जैसे अपने ही कोई चाचा-मामा बोल रहे हैं. मंत्रमुग्ध सुनता रहा. बीच बीच में नारे. ग्यारह बजे घर लौटा तो पता ही नहीं चला पापा ने कितना डांटा...उनके थप्पड़ों में जैसे उस दिन कोई जान ही नहीं थी.


उस बार जनमोर्चा या (जनता दल ?) से चुनाव एक ठाकुर साहब लड़ रहे थे. नाम अब याद नहीं. भीखमपुर रोड पर उनका दो मंज़िला मकान था साधारण सा. मैं वहां नियमित जाने लगा. शाम को मीटिंग होती थी और उसमें गाँव गाँव के वोट का हिसाब लगाया जाता था. एक दिन मैं बैठा था और मेरे ननिहाल पीपरपांती की चर्चा चल निकली. वे मेरे उस गाँव से रिश्ते को नहीं जानते थे. किसी ने कहा “ऊ त बभनन क गाँव ह. अहिरन क वोट मिल जाई. चमटोली त कांग्रेस के देई और पंडिज्जी लोग भी कांग्रेसे के वोट दिहें.” ठाकुर साहब बोले “देख शारदा मिसिर क वोट त समाजवादे के जाई. अ ऊ चमटोलियों से दिअइहें.” मेरा सीना गर्व से फूल गया. शारदा मिश्र मेरे नाना थे!


उस चुनाव में सुबह से हम सब सक्रिय थे. घर घर जाके पर्ची बाँट रहे थे. सुभाष विद्यालय में बूथ था. वहीँ चौकी पर जमे हुए थे. कोई तीन बजे एक जीप आई. हम चार पांच लोगों की ओर इशारा कर किसी ने कहा, “चल लोगिन” मैंने पूछा, “कंहवा.” “चल पहिले. “रस्ता में बतावल जाई.” हम लद गए. जीप देवरिया से दो एक किलोमीटर दूर किसी गाँव में रुकी. हमें सीधे बूथ के भीतर ले जाया गया. उंगली में स्याही लगी और वी पी सिंह की पार्टी को पांच वोट मिल चुके थे!


वी पी सिंह आये और उनके पीछे पीछे आया मंडल कमीशन. हम सब जो उनके भक्त थे रातोंरात उनके विरोधी बन गए. घर में, मोहल्ले में, कालेज में हर जगह उन्हें गालियाँ दी जाती थीं. स्थानीय अखबार मंडल कमीशन के खिलाफ उठ रहे आन्दोलनों के विस्तृत समाचारों से भर गए. एक गुस्सा हम सब के भीतर कसमसा रहा था. एक शाम यों ही बैठा था तो मम्मी बोलीं, “पढ़ क्यों नहीं रहे?” मैंने कहा “जब नौकरी मिलनी ही नहीं है तो पढ़ के क्या फ़ायदा!” पापा हमसे तो नहीं लेकिन घर आने जाने वाले चाचा लोगों से ऊंची आवाज़ में मंडल कमीशन की लानत मलामत करते. दलितों का आरक्षण पचा पाना पहले ही सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लिए मुश्किल था. अब पिछड़े भी! कालेज के इंटरवल में अब क्रिकेट की जगह मंडल की बातें होने लगीं. एक दिन यह तय किया गया कि कल से आन्दोलन शुरू करना है.


अगले दिन भी रोज़ की तरह सुबह प्रार्थना के लिए सभा लगी. प्रार्थना अभी ख़त्म भी न हुई थी कि मैं भाग के स्टेज पर पहुँचा. आवाज़ तब भी इतनी भारी थी कि माइक की ज़रुरत नहीं थी. भाषण देना शुरू किया. प्रिंसिपल साहब सहित सारे शिक्षक भौंचक्के! उन दिनों इलीट माने जाने वाले जी आई सी के इतिहास में ऐसी पहली घटना थी यह. होरा सर तो सीधे अंकल ही थे. पर उस दिन न किसी का डर लगा न कोई हिचक. भाषण ख़त्म होते होते अपील की गयी स्कूल के बहिष्कार की और किसी ने छुट्टी की घंटी बजा दी. सारे छात्र सड़क पर निकल आये. नारे गढ़ लिए गए. “मंडल आयोग मुर्दाबाद”, “बर्बादी का दूसरा नाम – राम विलास पासवान”, “राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है”...जुलूस महाराजा अग्रसेन इंटर कालेज पहुँचा. छुट्टी की घंटी बजा दी गयी. सारा कालेज मैदान में और एक ऊंची जगह खड़े होकर मेरा भाषण. फिर यही कहानी बी आर डी इंटर कालेज में. फिर एस एस बी एल इंटर कालेज. रास्ते में कस्तूरबा गर्ल्स इंटर कालेज था पर उसके पास जाने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. कोई ढाई हज़ार छात्र! सड़क पर चक्का जाम का वह किस्सा होरा अंकल आज भी सुनाते हैं. सड़क पर लेटे हुए हम लोग. चीखते हुए “हमारी लाश से लेकर जाओ गाड़ी”...सारा जुलूस पहुँचा जिलाधीश कार्यालय और सभा में तब्दील हो गया. तभी अचानक शहर के डिग्री कालेज के नेता लोग आ गए. मंच पर चढ़ गए. मुझे मदन शाही और शिवानन्द शाही के नाम याद हैं. और लोग भी थे. ये सब वी पी सिंह के समर्थक रहे थे कभी. लड़कों ने नारा लगाया, “नेता नूती नीचे उतरो”, “हमारा नेता अशोक पांडे” वे बडबडाते हुए नीचे उतर आये. मैंने कोई आधे घंटे भाषण दिया. नीचे उतरा तो कुछ दोस्त चाय और समोसे लेकर खड़े थे...कई अखबारों के फोटोग्राफर और पत्रकार बात करने के लिए इतेज़ार कर रहे थे. अगली सुबह मैं छात्रनेता अशोक कुमार पाण्डेय में तब्दील हो चुका था...आश्चर्य इन सबके बीच न पापा की कोई डांट थी न मार. 


आन्दोलन एक बार शुरू हुआ  तो बढ़ता गया. मंडल आयोग विरोधी छात्र मोर्चा बना. मुझे उसका संयोजक बनाया गया. कोई विनीत त्रिपाठी बनारस से संयोजित करने आये थे. राघवनगर के एक घर में मीटिंग होती थी. रोज़ बयान ज़ारी होते. तय किया गया कि डी एम के बंगले के सामने क्रमिक अनशन हो. पंडाल बन गया. माइक वगैरह की सारी व्यवस्था हो गयी. रोज़ दो लोग सुबह से शाम तक अनशन करते फिर शहर का कोई गणमान्य व्यक्ति जूस पिलाकर अनशन तुड़वाता. पहले दिन मैं बैठा. मेरी ज़िद आमरण अनशन की थी लेकिन सबने मना कर दिया. इस बीच एक दिन तय हुआ कि सांसद मोहन सिंह को घेरा जाय. चार मोटरसाइकिलों से हमलोग उनके घर पहुँचे. मैं मदन शाही के पीछे बैठा था. ज्योंही हम उनसे बात करना शुरू किये उन्हें किसी बात पर गुस्सा आ गया. किसी ने शायद उनके ठाकुर होके नानजात के लोगों की तरफदारी पर छींटाकशी की थी. वे चिल्लाए, “छात्र बनते हैं ससुरे. अंग्रेजी आती है?” मुझे जाने क्या सूझा, बोला “कौन सी सुनेंगे? लालू वाली कि मुलायम वाली.” मेरा यह कहना था कि उनका पारा सातवे आसमान पर, “मारो सालों को” की आवाज़ गूंजी और वर्दीधारी लाठियाँ हमारे पीछे. मदन शाही ने तेज़ी से गाड़ी भगाई तो एक सिपाही ने डंडा चला के मारा. पीठ का वह हिस्सा अब भी कभी कभी दुखता है. अभी हाल में जब मोहन सिंह जी की मृत्यु हुई तो मुझे वह घटना याद आई. 


क्रमिक अनशन का कोई असर नहीं हो रहा था. हम कुछ ऐसा करना चाहते थे कि हंगामा हो. आत्मदाहों का दौर शुरू हो चुका था. लेकिन हम इसके एकदम खिलाफ थे. आखिर खुद मरने से क्या होगा मारना है तो उन सबों को मारो जो हमारी ज़िन्दगी चौपट कर रहे हैं. एक दिन मैं, आशुतोष, मनीष पाण्डेय और शायद रीतेश सिंह साथ बैठे थे. योजना बनी कि मनीष के घर के सामने जो गोदाम है उसमें आग लगा दी जाय. वह ऍफ़ सी आई का गोदाम था. रात का कोई समय तय किया गया. हम एक लीटर के करीब डीजल लेकर पहुंचे. वहां समझ आया कि इतने तेल से तो एक बोरी अनाज फूंकना मुश्किल था. फिर भी तर्क आया कि ज़रा सी आग लग गयी और अनाज तक पहुँच गयी तो बाक़ी अपने आप हो जाएगा. तो दीवार के एक कमज़ोर लग रहे हिस्से पर डीजल डाला गया. माचिस रगड़ी गयी. पर माचिस जले ही नहीं. एक एक करके तमाम तीलियाँ ख़त्म हो गयीं. धमाके की हमारी योजना धरी की धरी रह गयी. रीतेश इन दिनों लन्दन में डाक्टर है. आशुतोष शायद कृषि वैज्ञानिक. मनीष इंजीनियर बनने दक्षिण के किसी कालेज में गया था. वहीँ उसे नशे की लत लग गयी. मैं तो बीच के दिनों में शहर से एकदम ग़ायब ही रहा लेकिन उसके घर के पास रहने वाले एक दोस्त ने पिछले दिनों लखनऊ में बताया कि उसके नशे की लत इतनी भयानक हो गयी थी कि लाखों का क़र्ज़ हो गया था. एक दिन उसकी लाश उसके घर में ही पंखे से लटकती मिली. उसकी मम्मी मारवाड़ी इंटर कालेज में हिंदी की शिक्षक के रूप में बहुत प्रसिद्द थीं. पापा प्रदेश के जाने माने शिक्षक नेता थे. भैया देवरिया से रुड़की इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश पाने वाले पहले छात्र. मनीष शुरू से अलमस्त तबियत का था. नशे ने ख़त्म न किया होता तो आज वह हमारे बीच होता.


खैर, इस योजना की समाप्ति के बाद बनी गिरफ्तारी देने की योजना. रोज़ कुछ लोग गिरफ्तारी दे रहे थे. जिस दिन मेरा नंबर था मेरे साथ कालेज के कुछ और मित्रों को गिरफ्तारी देना था. उस दिन ननिहाल में कोई फंक्शन या पूजा थी. रात भर वहीँ रहा था. नानी को छेड़ता रहा, “ए नानी हम जेल चलि जाईं त तू रोअबू?” नानी कहतीं, “अब बुढौती में इहे कुल दिन देखाव तू. ” सुबह सीधे वहां से तय जगह पहुँचा. जुलूस निकला. गिरफ्तारी की जगह तक पहुँचते पहुँचते दसेक लोग रह गए. गिरफ्तारी के पहले दरोगा ने कहा कि “अच्छे खासे पढ़े लिखे शरीफ घर के लड़के लग रहे हो तुम लोग. क्यों जेल जाना चाह रहे हो. घर जाओ.” “संख्या तीन रह गयी” जेल के दरवाजे पर फिर उसने जब यही दोहराया तो एक और मित्र शहीद हुए. अंत में मैं और एस एस बी एल का एक छात्र जेल के भीतर पहुँचे.


भीतर पार्टी का माहौल था. जलेबी, समोसे, कचौरी चल रहे थे...पर मेरा मन तो अटका था कि पापा को पता चलेगा तो क्या होगा?

                                      ....................जारी है .....
                                      

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी      


रविवार, 7 सितंबर 2014

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर - अशोक आज़मी - चौथी क़िस्त





इस संस्मरण के बहाने ‘अशोक आज़मी’ अपने बचपन के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पागलपन को याद किया था, जिसमें बहुसंख्यक समाज ‘विवेक-च्युत’ होता हुआ दिखाई देता है | इस चौथी क़िस्त में वे किशोरावस्था के उन वर्जित प्रदेशों की यात्रा कर रहे हैं, जिसके बारे हमारे समाज में कहने और सुनने की एक अघोषित सी मनाही रखी गयी है |  
                                  



    तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               


             “ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की चौथी  क़िस्त

                         

                          “मुंहासों ने बचाया मुझे”



तेरह चौदह की उम्र बड़ी ग़ज़ब होती है. अब जो रासायनिक बदलाव आते हैं वो तो आते ही हैं लेकिन सबसे जबरदस्त होता है बड़े हो जाने का एहसास. मेरे साथ यह अलग से रहा है कि मेरी हमेशा अपनी उम्र से अधिक उम्र के लड़कों से दोस्तियाँ हुई हैं और खुद को अपनी उम्र से अधिक महसूस करने की एक ख़ब्त रही है. तो तेरह चौदह का होते होते मेरी मोहल्ले के तमाम दादा टाइप लोगों से दोस्ती हो चुकी थी. उस मोहल्ले का समाजशास्त्र भी थोड़ा अलहदा था. कसया ढाला के उस पार की बसाहट को देवरिया में आधुनिक माना जाता था. और हमारी ओर वाले को बैकवर्ड. पुराना मोहल्ला था गलियों और गंदगी से भरा पूरा. सबसे बड़ी आबादी श्रीवास्तव लोगों की थी. इसके अलावा कथित छोटी जाति के लोग भी प्रचुर मात्रा में थे. मोहल्ले के पीछे खाली मैदान थे जहाँ अब तमाम नए बने घरों में से एक मेरा भी है. तब हम उसमें क्रिकेट खेला करते थे. श्रीवास्तव लोगों के साथ ख़ास बात यह थी कि लगभग सब एक दूसरे के रिश्तेदार थे. जनसंख्या के मामले में भी तब ये परिवार बड़े उत्पादक थे. हमारे मकान मालिक की चार लडकियाँ और दो लड़के थे. बाक़ी घरों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी. आम तौर पर लोग सरकारी नौकरियों में बाबूगिरी करते थे. भ्रष्टाचार रोज़ सुनाये जाने वाली गर्वोक्ति थी. पापा इन सब को लेकर थोड़ा सुप्रियारिटी काम्प्लेक्स में रहते थे. स्केल की भी और ईमानदारी की भी. उन्हें हम भाइयों का मोहल्ले के आम लड़कों से मिलना जुलना पसंद नहीं था. भाई तो खैर कम से कम छात्र जीवन तक उनका श्रवण कुमार ही रहा, लेकिन मैं हमेशा से सरदर्द रहा. क्रिकेट का नशा बढ़ता जा रहा था और क्रिकेट के लिए संगत तो उन्हीं की मिलनी थी. सख्ती खूब होती थी, पिटाई हफ्ते में एकाध बार तो हो ही जाती थी, कई बार तो फील्ड से ही पिटते हुए आये लेकिन सुधरने वाले हम तब भी नहीं थे.


एक तरफ पापा के कालेज के शिक्षकों की सोसायटी थी, जिसे आप शहर का अपक्लास कह सकते हैं. उन दिनों एक दूसरे के घर जाना, मिलना जुलना लगभग नियमित सी चीज़ थी तो पापा के ग्रुप के तमाम लोगों के बच्चे हमारे अच्छे दोस्त थे. मजेदार बात यह कि इनमें लडकियाँ ज्यादा थीं. कई कान्वेंट में पढ़ती थीं. अंग्रेजी बोलती थीं, तो पापा की जो रोज़ की इंग्लिश स्पीकिंग क्लास थी उसके भरोसे मुझे वहां भी बहुत बेईज्जत नहीं होना पड़ता था. दूसरी तरफ मोहल्ले का गैंग था. शुद्ध भोजपुरी बोलने वाला. वहाँ मैं सहज भी था और उसके लिए पापा की किसी ट्रेनिंग की ज़रुरत भी नहीं थी. इस तरह कुल मिला जुला के दिन अच्छे गुज़र रहे थे. 

इस बीच वह हुआ जिसने मेरे पूरे किशोर जीवन पर एक काली छाया सी डाल दी. इस उम्र तक फ़िल्मी जानकारी के अलावा सेक्स के किसी ज्ञान से मैं अनभिज्ञ था. उम्र के साथ जो एक अतिरिक्त आकर्षण होता है, उसके अलावा कल्पनाओं में भी अभी किसी दैहिक फंतासी का कोई प्रवेश नहीं हुआ था. वह जाड़े का कोई दिन था, छुट्टी का दिन. हम हमेशा की तरह पीछे स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेल कर वापस लौटने से पहले बैठ कर गप्पें मार रहे थे. आमोद और दीपू भैया अचानक उठ के दूसरी तरफ चले गए. एक दो और लड़के थे जो देख देख के मुस्कुरा रहे थे. मेरी समझ में कुछ नहीं आया तो मैंने पूछा. उन्होंने आपस में कुछ इशारा किया और मुझे साथ आने को कहा. हम पीछे प्रमोद चाचा की फैक्ट्री की तरफ गए तो उन्होंने मुंह पर उंगली रख के चुप होने का इशारा किया. एक कोने में कटरेन का पर्दा डाल कर पेशाब वगैरह के लिए आड़ कर दी गयी थी. उसी की एक दरार से उन्होंने भीतर देखने का इशारा किया. मैंने देखा कि दीवार पर दोनों हाथ रखके आमोद टिका हुआ है और उसके पीछे दीपू भैया ने उसे कंधे से पकड़ा हुआ है और धीमे धीमे हिल रहे हैं. दोनों की पैंट्स घुटने के नीचे सरकी हुईं थीं. एक पल मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं वहां से निकला और तेज़ी से घर की तरफ भागा. पहले छत पर एक कोने में बने स्टोर में दीपू भैया को अलग अलग लड़कों के साथ जाते, और हमारी नज़र पड़ने पर हमें डांट के भगाते कई बार देखा था. तब कुछ समझ में नहीं आया था. इस घटना के बाद न जाने क्या हुआ कि दीपू भैया से डर और बढ़ गया. मैं उनसे भागा भागा रहने लगा. वह होते तो मैदान तक जाके भी क्रिकेट नहीं खेलता. छत पर वह पतंग उड़ा रहे होते तो मैं नीचे उतर आता.

दीपू भैया का घर हमारे ठीक नीचे था. आँगन के बाद लोहे का एक जाल लगा था जिसके नीचे उनका आँगन था. मकान मालिक के रिश्तेदार थे वे लोग तो किराया नहीं लगता था. उनके पापा शायद सिंचाई विभाग में बाबू थे. दो बहने और तीन भाई. सबसे बड़े दीपू तब बारहवीं में थे और सबसे छोटा शोभित जो तब अभी जन्मा भी नहीं था. उनके पापा रोज़ शराब पी के आते और अक्सर दीपू भैया पिटते थे. नशे में अगर पापा से टकरा गए तो एक ही लाइन दुहराते, “प्रणाम गुरु जी. आपके त बतिये निराला बा. देखेलीं आपके लइकन के त जिऊ जुरा जाला. हमरो दुइये ठो होतं स त देखा देतीं दुनिया के” और पापा किसी तरह पिंड छुडा के निकल पड़ते. बड़ी दीदी दीपू भैया से एक साल छोटी थीं और उसके बाद बुच्चन दीदी मुझसे एक साल बड़ी. दोनों बहनें मुझे राखी बाँधती थीं. जब तक देवरिया आना जाना रहा यह रिश्ता बना रहा. मैं गोरखपुर से लौटता और मिलने जाता तो अन्दर बच्चन दीदी के कमरे में हम घंटों गप्पें मारते. वह पूछतीं, “कोई गर्लफ्रेंड बनी कि वहां भी दीदी ही बना रहे हो सबको” और ठहाका लगा कर हंस पड़तीं. मैं पूछता, “आपको मिला कोई?” तो कहतीं, “अपनी किस्मत में को लाला ही आयेगा. किसी सरकारी विभाग का बाबू.” दीपू भैया पढाई वगैरह में तो फिसड्डी थे लेकिन बाक़ी सर्वगुण संपन्न. मकान में किसी की लाईट खराब हो जाए, किसी का नल खराब हो जाए, किसी के यहाँ कोई फंक्शन हो, दुर्गापूजा हो, जन्माष्टमी हो, दीपू हैं तो कोई टेंशन नहीं. बाद में उन लोगों ने मकान बनवा लिया मोहल्ले के पीछे के मैदान के ही एक टुकड़े में. अंकल का पीना बदस्तूर ज़ारी रहा. जाड़े की एक रात देर से पीकर लौटे तो किसी ने दरवाज़ा ही नहीं खोला. वह गालियाँ देते, दरवाज़ा पीटते थक गए तो बरामदे में ही सो गए. घरवाले सबक सिखाना चाहते थे. शायद वह सीख भी गए. लेकिन उस सबक का कोई असर लेने की हालत में नहीं रहे. सुबह चाची ने दरवाज़ा खोला तो वह वैसे ही पड़े थे...बस अब साँस भी नहीं चल रही थी. दीपू भैया इन दिनों अनुकम्पा नियुक्ति में मिली उसी नौकरी में हैं और खूब पैसा पीट रहे हैं.


खैर, सेक्स से वह मेरा परिचय जिस तरह हुआ था वैसे ही और घनिष्ठ होता गया. पूरा मोहल्ला जैसे सेक्स से बजबजा रहा था. समलैंगिक सम्बन्ध तो इतने कामन थे कि एक बार समझ के आने के बाद वह चारों तरफ नंगे दिखाई देते थे. हालत यह कि खुद दीपू भैया नहीं जानते थे कि उनके शिकारों का सबसे बड़ा शिकार उनका अपना छोटा भाई है. एक बार खुल जाने के बाद उन लड़कों ने मुझसे ये बातें करनी शुरू कर दीं. किसका किससे क्या चल रहा है, यह जानने की रूचि उस उम्र में सारे आदर्शों पर भारी पड़ती थी. फिर प्लास्टिक की पन्नी में पैक वे रद्दी काग़ज़ पर छपीं किताबें. एक तरफ पापा और नाना के आदर्श थे, गीता प्रेस की किताबें थीं तो दूसरी तरफ मस्तराम की किताबें और मोहल्ले के कोनों अतरों में फैले ये किस्से. पापा का डर और माँ की सख्त निगरानी थी कि लम्बे समय तक इनका हिस्सा बनने से बचा रहा. लेकिन वर्जित फल खाने की वह इच्छा कब तक रोकता? समलैंगिक संबंधों से मुझे घिन आती थी, तो दोस्तों ने दूसरा इंतजाम किया. वह लड़की हमारी गली के अंतिम छोर पर रहती थी. वैसे तो हिंदी का लेखक होने से यह सुविधा है कि लगभग तय है कि यह संस्मरण उसके पास तक नहीं पहुंचेगा, फिर भी उसका नाम नहीं ले रहा. स्कूल में ही उसे बुलाया गया था. एक ठेले के अन्दर वह इंतज़ार कर रही थी. मैं कांपते पैरों से पहुँचा. बाक़ी दोनों दोस्त वहीँ खड़े हो गए और मुझे अन्दर जाने के लिए कहा. जब मैं अन्दर गया तो उसने मुझे एक निगाह देखा और फिर बाहर निकल आई. उन लड़कों से कुछ कहा और चली गयी. मैं हतप्रभ. निकल कर उनके पास गया तो उनमें से एक ने कहा, “ अबे तोरी चेहरा पे ई मुंहासा बा न. कहतिया छुअले से ओहू के हो जाई. एहिसे भाग गईल ह.” 


मैं घर लौट आया. सीधे शीशे के सामने जाकर खड़ा हुआ. दोनों गालों पर उगे मुंहासों को गौर से देखा. काले चेहरे पर गंदे मुंहासे. मैं फोड़ दिया करता था तो तमाम निशानात बन गए थे. अपना चेहरा इतना बदसूरत कभी नहीं लगा था. एक आलमारी में माँ का फेस पाउडर रखा था. उसे अब रोज़ चोरी चोरी लगाने लगा. पापा जो साफी लाये थे उसे बिला नागा दिन में दो बार दो चम्मच पीने लगा. जो आता चार सलाहें दे जाता. मेरा चेहरा देशी दवाइयों की प्रयोगशाला बन गया. लेकिन मुंहासे न खत्म होने थे, न हुए.


एक अजीब सी हीन भावना भरती चली गयी. जिन लड़कियों से साथ बचपन से खेला था उनके सामने पड़ने से कतराने लगा. मिलना ही पड़े तो नज़रें चुराता. वे किसी बात पर हंस पड़तीं तो लगता मुझ पर ही हंस रही हैं. पढ़ाई का बहाना करके शादियों, पार्टियों में जाने से बचता. अजीब अजीब से सपने आते. एक सपना तो बरसों आता रहा. मेरी शादी हो रही है. पंडित जी मंत्रोच्चार करा रहे हैं, अचानक लड़की उठ कर खड़ी हो जाती है और कहती है “इसके चेहरे पर मुँहासे हैं, मैं नहीं करुँगी इससे शादी. 


इंटर में पढता था तो हिंदी पढ़ने मिसेज शुक्ला आंटी के यहाँ जाता. उनके पति पापा के दोस्त रहे थे और उनकी अकाल मृत्यु के बाद आंटी की उन्हीं की जगह नियुक्ति हुई थी. मिसेज शुक्ला आंटी जैसी जीवट वाली और मृदुभाषी महिला मैंने आज तक के जीवन में नहीं देखी. मेरी पहली कविता पापा ने आंटी को ही दिखाई थी और उन्होंने कहा था, “इसे रोकियेगा मत. इसमें कवि होने की क्षमता है.” अभी हाल में कहीं मेरी कविता पढ़ के उन्होंने फोन किया और खूब आशीर्वाद दिया. वैधव्य के पहाड़ से दुःख और उस छोटे से क़स्बे के तमाम अनर्गल लांछनों के बीच उन्होंने पम्मी दीदी और मिनी को जिस तरह की परवरिश दी वह अद्भुत थी. मिनी एकदम मेरी उम्र की थी. पहले किसी संदर्भ में जिस दिवा का नाम लिया है वह यही मिनी थी. पहले आंटी हनुमान मंदिर के बगल वाली गली में एक मकान के पहले तल्ले पर रहतीं थीं. बाद में देवरिया ख़ास में उन्होंने मकान बनवा लिया.  हम अक्सर उनके घर जाते और हम तीनों लूडो, व्यापार वगैरह खेलते थे. लेकिन अब हालत यह थी कि मिनी मुझसे सहजता से हाल चाल पूछती, पढ़ाई की बात करती और मेरे मुंह से हाँ-ना कुछ नहीं निकलता. वह झुंझला जाती या कभी कभी हंस पड़ती और मैं पढ़ाई ख़त्म करते ही इतनी तेज़ भागता कि एक बार आंटी ने पापा से कहा कि “बहुत तेज़ साइकल चलाता है सोनू.”


यह हीनभावना वर्षों मेरे भीतर भरी रही. कालेज आने के बाद भी और एक हद तक अब भी. लेकिन उस रोज़ तो मुंहासों ने ही मुझे बचाया. उस घटना के बाद मैंने उन दोस्तों और उन बातों से खुद को पूरी तरह काट लिया. इसकी एक दूसरी वजह थी नाना के यहाँ आने वाली पत्रिकाएँ. धर्मयुग और सारिका से वह मेरा पहला परिचय था. समझ में कितना आता था यह पता नहीं लेकिन हर रविवार को वहाँ जाने पर इन पत्रिकाओं में डूब जाता. राजनीतिक पत्रिकाएं भी उनके पास खूब होती थीं. रेलवे लाइब्रेरी से वह साहित्यिक किताबें भी ले आते. मैं उन्हें चाट जाता. उन दिनों पढ़ी एक किताब अब तक याद है, मास्ति वेंकटेश आयंगर का उपन्यास चिक्क्ववीर राजेन्द्र. सच कहूं तो नाना की किताबों की वह छोटी सी आलमारी और शुक्ला आंटी का पढ़ाना ही मुझे साहित्य और राजनीति की दुनिया में ले आया. कवितायें पहले भी लिखता था अब खूब लिखने लगा. कई कई डायरियां भर गयीं. पापा कभी रोकते नहीं थे. यह सब बारहवीं के उस रोज़ तक चला जिस रोज़ कालेज की प्रार्थना के बीच जाकर मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने स्कूल बंद करवा दिया. वह किस्सा आगे. अभी उसी दौर के एक गीत से बात ख़त्म करता हूँ, बहुत सारी दूसरी चीजों की तरह इस गीत का भी एक बंद भूल गया है.


वेदना की आरती से
प्रिय तुम्हारी वंदना है
टूटी बिखरी ज़िन्दगी की
अश्रु ही अभिव्यंजना हैं

नेह का पावस नहीं है
शत शरद के गीत झूठे
देख ना प्रिय वेश बदले
ग्रीष्म ही सावन बना है

वेदना की आरती से...

चाहता था पुष्प के
कुछ माल गूथूं पर प्रिये
कंटकों के इस नगर में
पुष्प तो बस कल्पना हैं

वेदना की आरती से ...


                                         ....................जारी है .....
                           


परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी