रविवार, 3 मई 2015

अर्चना कुमारी की कवितायें



                                  अर्चना कुमारी 


सिताब दियारा ब्लॉग हर नयी आहट का स्वागत करता है | और उनके जज्बे को सलाम भी, जो इस कठिन और विपरीत दौर में भी सृजनरत हैं | तो आईये, इसी क्रम में आज इस युवा कवयित्री ‘अर्चना कुमारी’ से रूबरू होते हैं, जिन्हें हम सब फेसबुक के मंच पर ‘बाबू शांडिल्य’ के नाम से जानते हैं |

    
            तो प्रस्तुत है आज सिताब दियारा ब्लॉग पर
                  अर्चना कुमारी की कवितायें

एक .... 


मन को समझा रही हूँ इनदिनों
कि करीबी को फासले पर रखा जाए
बहुत नजदीकियाँ
तब्दील हो जाती हैं खालीपन में
भीतर गूँजती रहती है
बर्तनों के खुरचने की आवाज

अन्भयस्त अनाड़ी कान
मृदुता की आहट पर आँख गड़ाए
पाँव पर खड़ा करते हैं सन्नाटा

अनायास अपनाए हुए लोग
सायास विदा देकर
अहसास को आभासी करार देते हैं

गिन सकती हूँ वो लोग
जिनके लिए मैं हूँ
जिन्हें फिक्र है उपेक्षाओं की
और जो जानते हैं कीमत मेरी

ये बाजारवाद का दौर है
और मैं एकदम कोरी व्यापार में
कर्ज बढता रहा चक्रवृद्धि ब्याज के साथ
ठीक ठीक हिसाब मूलधन का
लापता रहा गणित के अध्याय से

दुनियादार होना
जरुरत है आज की
बेशउर होना हुनर तो नहीं

दरवाजे पर ठोंक दो
लोहे की साँकल
अनुमति आवश्यक है
आगमन और विदा से पूर्व
औपचारिकताएँ बचा रखेंगी
हमें खरोचों से !!!

दो ....

कहानियों के शहर में
प्रतिद्वन्द्वी हैं कविताएँ
कवि हतप्रभ निहारता है
गद्य का सौष्ठव कमनीयता में

कहानी के हर किनारे पर
कविता बैठी है
पाँव डुबोने भर चाह में
अँजुरी में नदी भरना
आँख का समन्दर होना

रेस में दौड़ते हुए पैरों की धुन से
औकात नापना जीत की
यह चलन आम है
खास यही है इनदिनों
कि कोई विस्मयादिबॊधक चिह्न नहीं शेष

शब्दों का बाजारवाद
भावों का मोल लगाता है
सेंसेक्स की साँस के साथ
सपने मीना बाजार में सजे हुए
आते हैं मरे हुए लोगों की शक्ल में

इल्म की पट्टी बाँधती है गौरैया
आँख से कान तक
सुनने और देखने से इतर
सूँघती है नाक से
आकाश की हवा का रंग
चोंच भर खुशबू से
दरिया का हवा होना

कवि तुम निरे बुद्धू हो
व्यवसायिक बनो कहानीकार की तरह
लिखो अन्तहीन कविताएँ
श्रृंखलाबद्ध
कहानियों के मुहाने बाँध कर
मिट्टी भर बाँध

सागर भर बूँद से
सींचना रेत भर आग
मन भर की नमी
और तन भर का सोंधापन
कहानियों की पोर पर
कोर भर कविता!!!


तीन ...

पीड़ाएँ अराजक हो गयी हैं
और शब्द आक्रामक
चाहने का कोई एक बिन्दु
जिस पर आम सहमति हो
और इच्छाओं का एक अध्याय
मात्र एक अक्षर का
आशाओं की पुस्तक
स्थिर हो एक शब्द में

नये सिरे से परिभाषित करना होगा
अनावश्यक विस्तार
और जाती हुई परछाइयों को

मन की व्याधियाँ
तन को निकम्मी करती जाती हैं
अनुभूतियाँ सहानुभूति नहीं माँगती
दर्द की सर्जरी कौन चाहता है

जेनरल फिजिशियन की तरह
सुन कर लिख देना
दो चार दर्द निवारक
एन्टीबायोटिक और विटामिन्स की गोलियाँ
या कोई एन्जाईम....

मैं तुम्हें रेत की दीवारों में नहीं गिनती
तुम्हारा "प्रशान्त" होना
मेरे खाली हाथों में आकाश भरता है
विप्लव के संभावित दृश्यों के बाद
जब काली पुतलियाँ घूमती हैं
तुम्हारी ओर
आँखों का उजला हिस्सा
हो जाता है रंगीन
आश्वस्ति की एक किरण पाकर

अब आखिरी वक्त है
कुछ हुकहुकाते लम्हों का
मैं नन्हें हाथों से थामे हुई हूँ कमीज तुम्हारी
छोटे-छोटे पैर लड़खड़ाते हैं
गिरते-पड़ते तुम तक पहुँचते हैं
सर पर हाथ रख दो
अधीर मन साँस लेता है सुस्ताकर!!!


चार ....

पिंजरे में तब्दील होना
चिड़ियाँ का
कोई ख्वाहिश नहीं होती
एक पसंद आदतन बुनती है सीखचें
और नाम ईश्क का बदनाम हुआ अक्सर

मेरा चाहना
कि नाव बन जाऊँ साहिल का
बिन पतवार
हर लहर में मंझधार की कहानी हो
और कथ्य तैरता हो नाविक के स्वप्नों में

जैसे रोज चुनती दाना गौरैया
ठीक वैसे ही बिम्ब का चयन
कविता को अभिनीत कर दे
निर्वात के संयोजित अदृश्य में

हर बार करवट बदल लेने भर से
या कलम को घुमाने से
भाव का वृत-पथ नहीं बदलता
भँवर की तीव्र घूर्णनें लिखवाती हैं
बारम्बार एकरसता

कवि होना इतना सहज कभी नहीं हुआ
जिस दिन लिख दूँगी
तुम्हारी फरमाईशों पर
रंग बदलती कविता
मेरे नाम के आगे भी कवि होगा!!!!


पांच

डूबते सूरज संग
लम्बी होती परछाइयों का जन्म
ये थोड़ा कठिन समय होता है
परिस्थिति और समय की सापेक्षता का

अंधेरे की स्वीकार्यता
दिन के नाम विद्रोह नहीं लिखती
प्रतीक्षा की अन्तहीनता
साँझ के दीपक
और भोर की प्रार्थना को सौंप दी

आहटों की ऊँगलियाँ
पाँव गुदगुदाती हैं
मन को भरमाती हैं
मैं झाँक लेती हूँ उचक कर दरवाजा

कोई चिठ्ठी नहीं आती
मेरे पते पर
लोग लिखना भूल गये
डाकिए राह तकते हैं लिफाफों की महक का

वर्तमान की नीरसता
इतिहास की नीरवता में ढल कर
तन लाल 
मन श्वेत
पथ केसरिया 
यात्राओं के
किसी दिन
पोर-पोर हिना होगी
साँस-साँस मुक्ति
टूटने-पीसने के बाद
शाखों से!!!!


परिचय और संपर्क

नाम- अर्चना कुमारी

शिक्षा- एम.ए (संस्कृत)

पटना में रहनवारी


1 टिप्पणी:

  1. विलक्षण कविता-समझ वाली बाबू को गंभीरता से पढने के लिए सिताब-दियारा एक बड़ा प्लेटफार्म है | उसकी कविता मानवीय संवेदनाओं को लेकर बहुत गंभीर और व्यापक है | रामजी भाई अपने ब्लॉग के जरिये नए चेहरों को हमेशा आगे लाते हैं | रामजी भाई को साधुवाद और बाबू को हार्दिक बधाई ...

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